🌺 ऋषि चिंतन से 146🌺 Rishi chintan se 146🌺
*🥀//१९ जून २०२३ सोमवार//🥀*
*//आषाढ़ शुक्लपक्ष प्रतिपदा २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*प्रार्थना वास्तव में क्या है ?*
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👉 *"प्रार्थना" मनुष्य के मन की समस्त विश्रृंखलित एवं अनेक दिशाओं में बहकने वाली प्रवृत्तियों को एक केंद्र पर एकाग्र करने वाले मानसिक व्यायाम का नाम है।* चित्त की समग्र भावनाओं को मन के केंद्र में एकत्र कर चित्त को दृढ़ करने की एक प्रणाली का नाम प्रार्थना है। जब मनुष्य के मन में किसी प्रकार की इच्छा उत्पन्न होती है, वह संसार के व्यतिक्रम, दुरभिसंधि, प्रवंचना से क्लांत हो जाता है, कोई आश्रय नहीं दृष्टिगोचर होता, तब सब प्रकार से विवश होकर वह शक्ति और साहस के एक कल्पित आदर्श की मन में स्थापना करके आश्रय तथा सहायक की खोज में अपने ही आंतरिक जगत् में प्रवेश करता है। उसके अंतःकरण में परमात्मा की अमित शक्ति, अद्भुत सामर्थ्य एवं अतुलित बल की एक प्रतिमा निवास करती है। *इस मानस चित्र की सृष्टि उसकी व्यक्तिगत श्रद्धा, आत्मविश्वास एवं आस्तिकता के बल पर विनिर्मित होती है।* यह उसके वर्षों के संचित शुभ संस्कारों का स्थूल स्वरूप है। *उसके संस्कार ज्यों-ज्यों परिवर्तित होते हैं, त्यों-त्यों यह मानस चित्र बदलता और पुनः विनिर्मित होता है।* यह हमारे अपने दृष्टिकोण के अनुसार परमेश्वर का सर्वशक्ति संपन्न, अमित फलदाता परमेश्वर का चित्र है। *यह हमारी आस्था की मूर्ति है।* प्रार्थना में हम इसी आंतरिक शक्ति केंद्र की ओर उन्मुख होते हैं। यहीं से एक प्रकार का ऐसा बल उत्साह प्राप्त करते हैं, जो मन में किसी गुप्त सामर्थ्य के भण्डार को यकायक खोल देता है । *मन की यह आंतरिक गुप्त सामर्थ्य शरीर के अणु-अणु में अद्भुत बल का संचार करती है।* आशा की ज्योति जगमगा उठती है, पुरुषार्थ शक्ति से मन विभोर हो उठता है वहाँ से ऐसी शांतिदायक विचार धाराएँ प्रस्फुटित होती हैं, *जो प्रार्थी को अभय और सावधान बना देती हैं, यही प्रार्थना की स्पष्ट व्याख्या है ।*
👉 *एक तत्वदर्शी का कथन है कि प्रार्थना का सम्बन्ध मानव के परम पुनीत तत्व आत्मा से है।* आत्मा अनंत शक्तिवान है, सर्वगुण संपन्न, निर्विकार, निर्लेप है। उसमें पवित्र शक्ति का अज्ञेय खजाना है। मन इसके समीप निवास करता है। *मन अन्य सब अंगों की अपेक्षा सूक्ष्म एवं शक्तिशाली है।* वस्तुतः जिस समय मन की शक्तियाँ आत्मविश्वास से आंतरिक केंद्र पर एकाग्र हो जाती हैं, तब इस पर आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ता है, जो मन को अद्भुत सामर्थ्य से संपन्न कर देता है। *इसे दैवी प्रेरणा के नाम से अभिहित किया जा सकता है। आंतरिक दैवी प्रेरणा प्राप्त करने का नाम ही "प्रार्थना" है।*
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*प्रार्थना जीवंत कैसे बने ? पृष्ठ-०६*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/bfZlL5eQgdM
🌺 ऋषि चिंतन से 147 🌺 Rishi chintan se 147 🌺
*🥀//२० जून २०२३ मंगलवार//🥀*
*//आषाढ़ शुक्लपक्ष द्वितीया २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*उतावली के दोष से बचिए*
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👉 *"उतावलापन' मनुष्य स्वभाव का एक दोष है।* इसीलिए एक कहावत प्रचलित है- *"उतावला सो बावला।"* उतावले की समता बावले से करने का यही आशय है कि जिस समय मनुष्य उतावली में होता है उस समय उसमें कमोबेश वे सारी कमियाँ और विकृतियाँ आई रहती हैं, जो किसी बावले व्यक्ति में पाई जाती हैं।
👉 *"आवेग", "उद्वेग", "व्यग्रता", "अस्तव्यस्तता", 'अस्थिरता", "अधैर्य" अथवा "असंतुलन" आदि दोष बावले व्यक्ति के लक्षण हैं।* जिस प्रकार बावला व्यक्ति किसी काम को करते समय विचारों का संतुलन खोए रहता है, वह करता हुआ भी यह नहीं जानता, कि जो कुछ वह कर रहा है उसकी अस्तव्यस्तता के कारण ठीक नहीं हो रहा है। उसे वह इस प्रकार नहीं करना चाहिए, जिस प्रकार वह कर रहा है। कोई भी काम करने का एक तरीका होता है, एक व्यवस्था होती है। इसीलिए बावले व्यक्ति का कोई काम नहीं माना जाता। उसे उसकी निरर्थक क्रियाशीलता ही समझा जाता है। यही अवस्था किसी उतावले व्यक्ति की होती है। उसका भी कोई काम व्यवस्थित अथवा विश्वस्त नहीं होता। *इसीलिए "जल्दी का काम शैतान का" कहा जाता है।*
👉प्रायः होता यह है कि किसी काम को जल्दी से निपटाने के लिए लोग उतावली बरतते हैं किंतु उसका परिणाम उलटा ही होता है । उतावली के साथ किए हुए काम बहुधा जल्दी होने के बजाय देर में ही हो पाते हैं सो भी अव्यवस्थित, अस्त-व्यस्त एवं त्रुटि- पूर्ण। किसी काम को करने के लिए एक अपेक्षित गति तथा समय की आवश्यकता होती है। *जब मनुष्य किसी काम के लिए आवश्यक गति में बढ़ोत्तरी और समय में कटौती करेगा, दो घंटे के काम को एक घंटे की हड़बड़ी में पूरा करने में अंधाधुंध लग जाएगा तो उसका बिगड़ जाना स्वाभाविक है ।* अब क्षण-क्षण पर भूलें होंगी, गलतियों और कमियों को अवसर मिलेगा। तब उनको सँभालने, देखने और दूर करने में दोहरा परिश्रम करना पड़ेगा जिसमें अधिक समय लगेगा ही! *इस प्रकार समय की बचत तो नहीं होती, काम भी गलत-सलत होता है सो अलग।* जल्दी में गलतियाँ करते हुए उन्हें बार-बार संभालने की अपेक्षा, कहीं अच्छा है कि किसी काम को धैर्यपूर्वक सावधानी के साथ किया जाए ।
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*उतावली न करें, उद्विग्न न हों पृष्ठ-१०*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 148 🌺 Rishi chintan se 148 🌺
*🥀//२१ जून २०२३ बुधवार//🥀*
!! *अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं* !!
*//आषाढ़ शुक्लपक्ष तृतीया २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*🙏प्रार्थना के असंख्य लाभ🙏*
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👉 जिस प्रकार जप, पूजन, अर्चन, पाठ, हवन, अनुष्ठान, मन- संयम, आत्म-संयम एवं मनोजय के विभिन्न मार्ग हैं, *उसी प्रकार "प्रार्थना" भी एक प्रकार का सुव्यवस्थित आध्यात्मिक व्यायाम है।* जिस प्रकार दंड, मुग्दर, डम्बल इत्यादि की प्रक्रियाओं से शरीर पुष्ट होता है, अंग-प्रत्यंग सुदृढ़ होकर निरोगता, सौन्दर्य, परिश्रम की क्षमता, उपार्जन, उत्पादन आदि की समृद्धियाँ हाथ लगती हैं. *उसी प्रकार "प्रार्थना" के आध्यात्मिक व्यायाम से मनुष्य का मनोबल सुदृढ़ होता है, आत्मविश्वास, आत्मश्रद्धा. इच्छाशक्ति विकसित होती है।* कलुषित मन धुलकर स्वच्छ एवं पूर्ण पवित्र हो जाता है. चित्त में सुव्यवस्था, मन में एकाग्रता, बुद्धि में तीक्ष्णता तथा विवेक की जाग्रति में असाधारण उन्नति होती है।
👉 *इन उन्नतियों के कारण पेचीदा तथा सुदृढ़ कार्यों को भी सरलतापूर्वक संपन्न कर लिया जाता है।* पूजा अनुष्ठान की कर्मकाण्डमयी प्रक्रियाओं का मनोवैज्ञानिक पद्धति के अंतर्मन के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ता है। *मनुष्य को अपनी सफलताओ में अपेक्षाकृत अधिक विश्वास हो जाता है।* दैवी कृपा सहायता मिलने के कारण आशा की पीठ बहुत भारी हो जाती है। साहस, आशा, उत्साह एवं सफलता का विचार मनुष्य के व्यक्तित्व में घनीभूत होकर घुमड़ने लगता है। *ऐसी मनोभूमि सफलता के लिए अत्यंत उर्वर क्षेत्र है।* प्रार्थना से सिक्त मानस प्रदेश वाले सैनिक उत्तम मनःस्थिति के कारण मोर्चे पर मोर्चा फतह करते जाते हैं ।
👉 *"प्रार्थना" तो एक प्रकार का प्रायश्चित है।* विभिन्न प्रकार के स्वार्थों, चिंताओं, व्याकुलताओं, रोगों, व्याधियों, दुर्बलताओं को प्रक्षालित करने के लिए यह एक सर्वसुलभ साधन है। *हमारे अभिमान के मिथ्यात्व को मिटा देने वाली महौषधि है।* प्रार्थना में जो संभावनाएँ, जो उत्तम इच्छाएँ प्रकाशित की जाती हैं, उनसे एक प्रकार का आध्यात्मिक प्रवाह फैलने लगता है। प्रार्थी के इर्द-गिर्द का समस्त वातावरण पवित्रता, शांति तथा विश्व प्रेम की पुष्ट धाराओं से धनीभूत हो उठता है।
👉 *जीवन के साथ आरंभ होने वाली "प्रार्थना" एक आशीर्वाद है, और जीवन की समाप्ति के साथ की जाने वाली प्रार्थना उस आशीर्वाद के प्रति हार्दिक कृतज्ञता है।* इन दोनों के मध्य में जीवन का कार्यक्षेत्र है। प्रार्थना के जल से अभिसिंचित होकर हमारी प्रार्थना तलवार के पानी की तरह हमारी कलाइयों के बल सहायता देती है, वह प्रतिक्षण श्वाँसों के संचार के साथ हमें बल प्रदान करती रहती है। *जब पवित्र तथा दिव्यता के ये सुमधुर क्षण क्रम-क्रम से हमारी एक-एक पुकार के साथ हृदय में नक्षत्रों की तरह चमकने लगते हैं, तब अंधकार भी सुहावना प्रतीत होने लगता है।* उस समय निराशा का तिमिर भी हमारे लिए सौंदर्यमय हो जाता है। हमारी साधना जीवन के घोर अंधकार में उस दिव्यता का दर्शन पाने के लिए व्याकुल हो उठती है । तब एक क्षण आता है, हमारी आशाएँ यकायक चमक उठती है, तब चंद्र दर्शन होता है । *वह हमारी प्रार्थना की शुभ ज्योति है, वह हमारी साधना का फल है । हम कृतज्ञता भरी आँखों से जिधर निगाह डालते हैं, एक हास्य, एक उल्लास और एक शोभा हमें दीख पड़ती है ।*
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*प्रार्थना जीवंत कैसे बने ? पृष्ठ-२६*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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*Yogotsav | Countdown Program | International day Of Yoga || 2023*
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https://youtu.be/mmeM-hjeaWw
🌺 ऋषि चिंतन से 149🌺 Rishi chintan se 149 🌺
*🥀//२२ जून २०२३ गुरुवार//🥀*
*//आषाढ़ शुक्लपक्ष चतुर्थी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖❗स्वभिमानी बनें❗➖*
*〰️‼️अहंकारी नहीं‼️〰️*
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👉 *"अहंकार" एक उद्धत ओछापन है, जिससे अपना आत्मिक स्तर गिरता है और जिनसे भी हमारा संपर्क बनता है, उनके मन में क्षोभ भरी प्रतिक्रिया होती है।* अहंकार एक प्रकार से दूसरों का अपमान है। जब हम अपना बड़प्पन जताते हैं, तब परोक्ष रूप से इसका अर्थ यह होता है कि दूसरों का मूल्य एवं महत्त्व कम करते हैं।
👉 *"स्वाभिमान" बिलकुल अलग बात है*, अहंकार बिलकुल उलटी, बिलकुल दूसरी। कई व्यक्ति अहंकार को ही स्वाभिमान समझते हैं। यह भारी भूल है। *आत्मा की शक्ति, सामर्थ्य, पवित्रता एवं उत्कृष्टता पर विश्वास करना और कोई ऐसा काम न करना, जिससे अपनी या किसी अन्य की दृष्टि में यह मूल्य घटता हो, "स्वाभिमान" है।* आंतरिक उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता को किसी भी मूल्य पर घटने न देना, भय और प्रलोभनों की परवाह किए बिना कष्ट सहते हुए भी अपनी उच्चस्तरीय गतिविधियों को अक्षुण्ण रखने में संतोष एवं गौरव अनुभव करना यह स्वाभिमान है। *ऐसे "स्वाभिमान" की रक्षा करनी ही चाहिए।*
👉 अहंकार वह है जिसमें अपनी दौलत, अक्ल, पदवी या ख्याति को चोट पहुँचते ही अपमान अनुभव होता है और इसे अपनी भारी क्षति समझकर प्रतिशोध के लिए भड़भड़ाहट उठती है। अपनी लौकिक स्थिति को आकाश-पाताल जैसी ऊँची मानना, उसे बढ़ा-चढ़ाकर बताना, जो उसी प्रकार की हाँ-हाँ करे, उससे प्रसन्न होना और जो आलोचना या निंदा करे उससे बिगड़ पड़ना, ये अहंकार के चिह्न हैं। *हर किसी के मुँह से प्रशंसा सुनने की लालसा केवल अहंकारी को ही हो सकती हैं ।*
👉 *हम "स्वभिमानी" बनें; "अहंकारी" नहीं ।* मनुष्य का गौरव मनुष्यता में है । सज्जन व्यक्ति नम्र, विनयशील, सीधे, सरल, सहिष्णु और उदार होते हैं । *यह आत्मिक गुणों का अमृत ही उन्हें इतनी तृप्ति देता रहता है कि फिर बाहरी प्रशंसा की शराब उन्हें सर्वथा निरर्थक प्रतीत होती है ।*
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*अहंकार में डूब मत जाइए पृष्ठ-३०*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 150🌺 Rishi chintan se 150 🌺
*🥀//२३ जून २०२३ शुक्रवार//🥀*
*//आषाढ़ शुक्लपक्ष पंचमी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*धैर्य एक बहुमूल्य और विलक्षण गुण*
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👉 *"धैर्य" हमारे संकटकाल का मित्र है।* इसी से हमें सांत्वना मिलती है। कैसी भी हानि या क्षति हो जाए, धैर्य उसे भुलाने का
प्रयत्न करता है। धैर्य न हो तो मानसिक दौर्बल्य के कारण मन सदा भयभीत रहेगा। जब मनुष्य के मन में शंका बढ़ जाती है, तब दुःख के मिट जाने पर उसका आभास रहा करता है।
👉 *जो व्यक्ति "धीरजवान" होते हैं, वे संकट के समय अपने विवेक को नष्ट नहीं होने देते।* उनके आत्मबल के कारण उस समय भी शांति मिलती है और दूसरे लोग भी उनका अनुकरण करने को बाध्य होते हैं। तब वह संकट उतना व्यथित नहीं करता, जितना कि धीरज के अभाव में।
👉 *"धैर्यवान" मनुष्य के अंतःकरण में अत्यंत शांति, भविष्य की सुखद आशा और उदारता की प्रबलता रहती है।* वह कुदिन के फेर में पड़कर घबराता नहीं, बल्कि उन दिनों को हँसते हुए टालने की चेष्टा करता रहता है।
👉 इसके विपरीत जिसके मन में धैर्य नहीं होता, उसके मन में जो आशा-निराशा की तरंगें उठती हैं, वे वैसी ही हैं जैसे कोई बालू की दीवार खड़ी होकर भी ढह पड़े। संकट के समय उसकी मानसिक वेदना बढ़ जाती है और वह अपने भावों पर नियंत्रण रखने में समर्थ नहीं होता। ऐसे लोगों की दशा बहुत खराब होती देखी गई है और उनमें भी कुछ अत्यंत दुर्बल प्रवृत्ति के मनुष्यों का मानसिक संतुलन तो यहाँ तक बिगड़ जाता है कि वे आत्महत्या तक कर बैठते हैं।
👉 *सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने के लिए ही नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य पालनार्थ भी कर्मों को सुव्यवस्थित करने के लिए "धैर्य" आवश्यक है।* मान लीजिए कि आप किसी मुकदमे में फँसे हैं, परंतु उसके निर्णय में विलंब है, इस बीच में कोई अधिकारी व्यक्ति उस मुकदमे की जाँच के समय आपको किसी बात पर डाँटता है तो उससे आपका विचलित हो उठना ही आपकी हार का कारण बन सकता है। यदि आप उसमें धैर्य से काम लें तो विजय प्राप्त कर सकते हैं।
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*उतावली न करें, उद्विग्न न हों पृष्ठ-१५*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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