🌺 ऋषि चिंतन से 151🌺 Rishi chintan se 151🌺
*🥀//२४ जून २०२३ शनिवार//🥀*
*//आषाढ़ शुक्लपक्ष षष्ठी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*--आप बहुत कुछ कर सकते हैं--*
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👉 *संसार में असंख्यों व्यक्ति ऐसे हुए हैं जिन्हें किसी प्रकार सांगोपांग प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला ।* सहायता करने वालों का भी कोई संयोग न बैठ सका, पर अपनी प्रबल उत्कण्ठा के बल पर उपलब्ध साधनों का टूटा-फूटा आश्रय लेकर ही आगे बढ़ते रहे । *उत्कण्ठा का चुम्बकत्व अभीष्ट स्तर का आकर्षण बनाये रखता है और जहाँ-जहाँ से अपनी बिरादरी के बिखरे कणों को समेट-बटोर कर अपने ज्ञान भण्डार में भर लेता है।* वैज्ञानिक आविष्कारकों में से कितने ही ऐसे हुए हैं जिन्हें अपनी कल्पना, दिलचस्पी और मेहनत के आधार पर अनेकों प्रयोगों का त्याग करना पड़ा और अनेकों बार असफलता प्राप्त करने के उपरान्त भी निराश न होने तथा सतत प्रयास करते-करते शानदार सफलता मिली । जेल के एक कैदी से लेखक को यह जानने का अवसर मिला कि उसने बचे हुए समय का उपयोग लोहे के तसले को स्लेट बनाकर कंकड़ों से पेन्सिल का काम लेते हुए साथियों में से जो कुछ जानते थे उनसे पूछ-पूछ कर अंग्रेजी पढ़ना-लिखना सीख लिया । एक पुराना अखबार कहीं से हाथ लग जाने पर उसी से पाठ्य पुस्तक का प्रयोजन पूरा कर लिया। विदेशों में दिन भर मजदूरी करने वाले श्रमिकों में से कितने ही ऐसे होते हैं जो रात्रि पाठशालाओं में दो घण्टे समय लगाते हुए धीरे-धीरे इच्छित भाषा के विद्वान, पदवी धारी बन जाते हैं । *कोई प्रयत्नशील प्रकृति का व्यक्ति यह शिकायत करते नहीं सुना गया कि उसे इसलिए पिछड़ना पड़ा कि परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं ।* उदारचेताओं ने आगे बढ़कर उस पर अनुदान नहीं बरसाये । *स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि मनुष्य को परावलम्बी स्तर का प्रकृति ने नहीं बनाया है ।* उसके पास ऐसा व्यक्तित्व जन्मजात रूप से विद्यमान है जो यदि चाहे तो अपने संकल्प, साहस और श्रम के बल पर ऐसे काम कर सकता है जिनके संबंध में साधन सम्पन्नों को भी आश्चर्यचकित होकर रह जाना पड़ता है । वर्ल्ड रिकार्ड की गिनीज बुक में ऐसे अनेकों उदाहरण अंकित हैं, जिनने सर्वथा विपरीत परिस्थितियों में से भी अपने सीमित साधनों के सहारे - चकित कर देने वाली सफलतायें अर्जित कर दिखाई । *छोटे से बड़े बनने वालों में प्रायः प्रत्येक में अपनी प्रचण्ड इच्छा शक्ति के सहारे आगे बढ़ने का साहस उभरा है।* साहस ने शक्ति दी है और उसे सुनियोजित करके सामान्य से असामान्य बनने का अवसर मिला है ।
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*प्रबंध व्यवस्था, एक विभूति, एक कौशल पृष्ठ-०७*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/lWJoiTfx0rk
🌺 ऋषि चिंतन से 152🌺 Rishi chintan se 152🌺
*🥀//२५ जून २०२३ रविवार//🥀*
*//आषाढ़ शुक्लपक्ष सप्तमी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖बड़े बनने के लिए➖*
*〰️❌धन-संपत्ति की नहीं❌〰️*
*🧑🎤सज्जनता की आवश्यकता है*
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👉 खर्चीली सजधज किसी का मान बढ़ाती नहीं, वरन् उसे धारण करने वाले को अधिक बचकाना एवं नट, अभिनेता स्तर का उपहासास्पद ही बनाती हैं । *"स्वच्छता" और "सादगी" किसी का बड़प्पन प्रकट करने के लिए पर्याप्त है ।* दूसरों पर रौब जमाने के लिए अपना बड़प्पन प्रदर्शित करने की आवश्यकता पड़ती है । इसके लिए कई लोग अपनी सजधज, ऐंठ, अकड़, दूसरों की उपेक्षा, अपनी व्यस्तता आदि को अनावश्यक ओढ़ते है और आशा करते हैं कि अन्य लोग अपने प्रभाव में आकर दब जायेंगे और जैसा कहेंगे वैसा करने लगेगे । यह मान्यता आदि से अन्त तक गलत है । कारण कि *अहंकार में दूसरों का अपमान जुड़ा होता है ।* जिसकी गंध किसी भी विचारशील मनःस्थिति वाले को सहज लग जाती है और उसकी प्रतिक्रिया विरोध, तिरस्कार में होती है । फलतः प्रतिष्ठा बढ़ने की अपेक्षा तो पूरी नहीं होती, उलटे सहानुभूति की मात्रा घटती चली जाती है । अन्तर्विरोध बढ़ जाने या बने रहने पर खिंचाई बढ़ती है, खाई चौड़ी होती है और संघर्ष जैसी मनःस्थिति बन जाती है। ऐसे वातावरण में तालमेल बैठ नहीं पाता और दिशा भिन्नता बन पड़ने से कटुता, प्रतिद्वन्दिता, प्रतिशोध जैसे तत्व उभर पड़ते हैं । गड़बड़ी के कारणों को समझना और समझाना कठिन हो जाता है । काम बनता नहीं बिगड़ता है। *इसलिए अपनी मुद्रा परिधान से लेकर व्यवहार तक में नम्रता ही रहनी चाहिए ।* सादगी और सज्जनता यह दो गुण ऐसे हैं जिन्हें अपनाकर कोई प्रबंधक लाभ में ही नहीं रहता, वरन् उलझनों को हँसते-हँसाते, भाई-चारे के
वातावरण में ही सम्पन्न कर लेता है ।* अच्छा होता इस स्तर का स्वभाव ही बन जाता और अभ्यास में उतर जाता, पर यदि ऐसा स्तर इसके पूर्व नहीं बन पड़ा है तो समय की आवश्यकता और कार्य की सुव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उसे प्रयत्नपूर्वक अर्जित कर लेना चाहिए । *स्मरण रहे कि बड़प्पन का रौब जमा कर जितना काम कराया जा सकता है उसकी तुलना में समता और सद्भाव का परिचय देकर कहीं अधिक और कहीं अच्छी तरह बात बनाई जा सकती है ।*
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*प्रबंध व्यवस्था, एक विभूति, एक कौशल पृष्ठ-१६*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 153🌺 Rishi chintan se 153🌺
*🥀//२६ जून २०२३ सोमवार//🥀*
*//आषाढ़ शुक्लपक्ष अष्टमी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*सत्य को सम्मान के साथ अपनाइए*
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👉 *"सत्य" भाषण वाणी का तप है , इससे "वाक सिद्धि" जैसी विभूतियों प्राप्त होती है, इसलिए सत्य भाषण का हर किसी को अभ्यास करना चाहिए उसके साथ ही "प्रिय भाषण" और "हित भाषण" के अलंकार भी जोड़ रखने चाहिए।* सत्य तो बोलना ही चाहिए, पर साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह प्रिय एवं मधुर भी हो और उस संभाषण से दूसरों का हित साधन भी होता हो। कटु, कर्कश, मर्मभेदी, दूसरों को लांछित, तिरस्कृत एवं अपमानित करने वाला, जिसमे दूसरों के अहित की संभावना हो ऐसा अनावश्यक सत्य भी कई बार सच बोलने के महान गुण को दोषयुक्त कर देता है । *इसलिए इस विकृति से बचने के लिए सत्य को प्रिय और हित इन दो आदर्शों के साथ संयुक्त करके प्रयोग करने का निर्देश दिया है। अप्रिय और अहितकर सत्य का भी निषेध किया है "न ब्रूयात सत्यमप्रियम्।"*
👉 *यह भ्रम दूर किया ही जाना चाहिए कि "सत्य" को अपनाने से मनुष्य धन और सम्मान की दृष्टि से घाटे में रहता है और झूठ का सहारा लेने पर आमदनी एवं इज्जत बढ़ सकती है।* इसी प्रकार इस भ्रम का भी निवारण होना चाहिए कि सत्य बोलना अथवा सत्य का अवलंबन कठिन है। वस्तु स्थिति उन भ्रांत धारणाओं से सर्वथा विपरीत है। *"सत्य" अति सरल है, जो बात जैसी है, उसे वैसे ही कह देने से मस्तिष्क पर कोई जोर नहीं पड़ता, कोई अबोध बालक या मंदबुद्धि भी बिना किसी कठिनाई के जो बात उसे मालूम है ज्यों की त्यों कह सकता है, किंतु यदि झूठ बोलना हो तो मस्तिष्क पर बहुत जोर देने की आवश्यकता पड़ेगी और ऐसी भूमिका बनानी पड़ेगी, जो पकड़ में न आ सके। मंद बुद्धि व्यक्ति झूठ बोले तो कहीं न कहीं ऐसी त्रुटि रह जाती है, जिससे वह अक्सर पकड़ में आ जाती है। कार्तिक के महीने में तरबूजे खाने की गप्प कोई मार तो सकता है, पर उसे यह भी ज्ञान होना चाहिए कि किस ऋतु में क्या चीज पैदा होती है ? यदि इसमें चूक हुई तो बनावट तुरंत खुल जाएगी।* बढ़ा-चढ़ाकर कही बात के भ्रम में कोई बिरले ही आते हैं। आमतौर से अधिकांश लोग समझ जाते हैं कि अपनी शान या शेखी जताने के लिए अथवा दूसरों को उल्लू बनाने के लिए यह बातें गढ़ी जा रही हैं। ऐसा संदेह होने पर उसकी इज्जत गिर जाती है और सामने भले ही न कहें मन में उसे झूठा मान लिया जाता है और झूठा व्यक्ति किसी का विश्वासपात्र नहीं हो सकता और न इज्जत पा सकता है। *यह निश्चित है कि झूठ सरल है, सत्य कठिन है, यह मानने वालों को जानना चाहिए कि झूठ बोलना और उसे खुलने न देना किसी अति चतुर का अति कठिन कार्य है।* सामान्य बुद्धि के लिए तो वह एक प्रकार से असंभव और इज़्जत को दाँव पर लगाने वाला ही है। *जो असत्यवादी, अविश्वासी माना जाता है, उसे किसी का सच्चा सहयोग नहीं मिलता।* स्वार्थ के लिए जो मित्र बने हुए थे, अवसर आने पर वे भी उसे धोखा देते हैं और गिरे में लात लगाते देखे जाते हैं ।
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*सत्य को पूर्वाग्रहों में न बांधें पृष्ठ-०८*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://www.youtube.com/live/f519W9PjSNI?feature=share
🌺 ऋषि चिंतन से 154🌺 Rishi chintan se 154🌺
*🥀//२७ जून २०२३ मंगलवार//🥀*
*//आषाढ़ शुक्लपक्ष नवमी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*शिष्टाचार वाणी से प्रदर्शित हो*
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👉 *सहयोग के महत्व को तो प्राय: सभी लोग स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि वर्तमान समय में मनुष्य को जीवन-निर्वाह-प्रणाली और सामाजिक व्यवस्था ऐसी हो गई है कि एक मनुष्य बिना दूसरे मनुष्यों के सहयोग के एक दिन भी नहीं चल सकता।* पर इस बात को बहुत कम। लोग जानते हैं कि वास्तविक सहयोग प्राप्त करने का क्या उपाय है ? *सहयोग की वृद्धि करने और उसे स्थायी बनाने का मुख्य साधन उत्तम व्यवहार है और उत्तम व्यवहार का एक बहुत बड़ा अंग शिष्टाचार है।* मनुष्य शिष्टाचार के द्वारा ही दूसरे व्यक्तियों को अपनी सभ्यता और संस्कृति का परिचय देकर उनको अपना मित्र, सहायक, हितैषी या अनुगामी बना सकता है।
👉 एक महापुरुष का कथन है- *"मुझे बोलने दो, मैं विश्व को विजय कर लूँगा।"* सचमुच शिष्टाचार युक्त मधुर वाणी से अधिक कारगर हथियार और कोई इस दुनियाँ में नहीं है। *जिस आदमी में ठीक तरह उचित रीति से बातचीत करने की क्षमता है समझिए कि उसके पास एक बहुमूल्य खजाना है।* दूसरों पर प्रभाव डालने का प्रधान साधन वाणी ही है, लेनदेन, व्यवहार, आचरण, विद्वत्ता, योग्यता आदि का प्रभाव डालने के लिए समय की, अवसर की, क्रियात्मक प्रयत्न की आवश्यकता होती है; *पर वार्तालाप एक ऐसा उपाय है जिसके द्वारा बहुत ही स्वल्प समय में दूसरों को प्रभावित किया जा सकता है।*
👉 *बातचीत करने की कला में जो निपुण है, वह असाधारण संपत्तिवान है।* योग्यता का परिचय वाणी के द्वारा प्राप्त होता है। जिस व्यक्ति का विशेष परिचय मालूम नहीं है उससे कुछ देर बातचीत करने के उपरांत जाना जा सकता है कि वह कैसे आचरण का है, कैसे विचार रखता है, कितना योग्य है, कितना ज्ञान और अनुभव रखता है। *जो दूसरों के ऊपर अपनी योग्यता प्रकट करता है ऐसे प्रमुख मनुष्य को बहुत ही सावधानी के साथ बरता जाना चाहिए।* कई ऐसे सुयोग्य व्यक्तियों को हम जानते हैं जो परीक्षा करने पर उत्तम कोटि का मस्तिष्क, उच्च हृदय और दृढ़ चरित्र वाले साबित होंगे, *परंतु उनमें बातचीत करने का शऊर न होने के कारण सर्वसाधारण में मूर्ख समझे जाते हैं और उपेक्षणीय दृष्टि से देखे जाते हैं।* उनकी योग्यताओं को जानते हुए भी लोग कुछ लाभ उठाने की इच्छा नहीं करते।
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*"शिष्टाचार" और "सहयोग" पृष्ठ-०६*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴
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https://youtu.be/6xG6yJOgpns
🌺 ऋषि चिंतन से 155🌺 Rishi chintan se 155🌺
*🥀//२८ जून २०२३ बुधवार//🥀*
*//आषाढ़ शुक्लपक्ष दशमी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*❗शिष्टाचार और सद्भावना ❗*
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👉 *"शिष्टाचार" का अर्थ बहुत से व्यक्ति केवल ऊपरी आवभगत से ही लिया करते हैं, पर ऐसी प्रवृत्ति बहुत कम उपयोगी होती है।* शिष्टाचार की कृत्रिमता दूसरे व्यक्तियों से छिप नहीं सकती और इससे उनके हृदय में वह मैत्री अथवा आत्मीयता का भाव जागृत नहीं होता जो वास्तव में सहयोग की शक्ति को उत्पन्न करता है और हमारे जीवन को लाभान्वित बनाता है। *इसलिए हमारे व्यवहार में साधारण "शिष्टाचार" के नियमों का पालन करने के साथ ही "सद्भावना" का होना अत्यावश्यक है।* इसके बिना दिखावटी शिष्टाचार अनेक समय दूसरे व्यक्ति के मन में ऐसा भाव उत्पन्न करता है कि हम किसी स्वार्थ या अन्य गुप्त अभिसंधि के कारण यह दिखावा कर रहे हैं।
👉 हम परस्पर संदेह और संशय करके तो भय को ही उत्पन्न करेंगे और एक-दूसरे का ह्रास और अंततः नाश ही करेंगे। *हमें आपस में "विश्वास" करना सीखना होगा। "विश्वास" की भित्ति पवित्रता है और पवित्र हृदयों में "विश्वास" उत्पन्न होता है।* पवित्र हृदय और निर्मल बुद्धि में सद्भावना का उदय होता है। सद्भावना परम आवश्यक है। *"सद्भावना" से ही आपस का दृष्टिकोण सम्यक बनता है।* सद्भावना के अभाव में तो एक-दूसरे में संदेह और भय की ही उत्पत्ति है। हम आपस में क्यों एक-दूसरे से भय करें।
👉 छिपी हुई दूषित अथवा विशुद्ध मनोवृत्ति, व्यवहार में प्रकट हो जाती है। *मनोवृत्ति को छिपा कर ऊपर से शिष्टता का व्यवहार भी बहुत देखने में आ रहा है, पर वास्तविकता छिपाए नहीं छिप सकती।* हमें सबको मित्र दृष्टि से देखना चाहिए, मन में किसी प्रकार की मलिनता को स्थान नहीं देना चाहिए, *पर साथ ही सचेत और सावधान भी रहना चाहिए कि कहीं हमारी सरलता से ही लाभ न उठाया जाए।* सतर्क और सावधान रहना चाहिए, पर मनोमालिन्य अच्छा नहीं।
👉 सद्भावना से एक-दूसरे को ठीक-ठीक जानना और आपस में एकता उत्पन्न करना, सहानुभूति से आपस में एक-दूसरे के हृदय में प्रवेश करना और हृदयों का समन्वय करना तथा सहयोग से सामर्थ्य प्राप्त करना यह क्रम है महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति का । *"सहयोग" एक यज्ञ है। यज्ञ कभी विफल नहीं हुआ। सभी शक्तियों में "सहयोग" होने से एक अत्यंत महान शक्ति का उदय होता है जिससे सभी में नया उत्साह, साहस और वस्तुत: कार्यक्षमता युक्त नवजीवन उदय होता है ।*
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*"शिष्टाचार" और "सहयोग" पृष्ठ-१८*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/kigLaZmsBSY
