![]() |
| Gayatri pariwar images rashtra nirman |
🌺 ऋषि चिंतन से 191🌺 Rishi chintan se 191🌺
*🥀 ०७ अगस्त २०२३ सोमवार 🥀*
*〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
*❗//➖द्वितीय श्रावण➖//❗*
*🌒 कृष्णपक्ष पंचमी २०८०🌘*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*➖❗अंत: श्चेतना जगाएं ❗➖*
*➖ईश्वर के अनुदान वरदान पाएं➖*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *परमार्थ प्रवृत्तियों का शोषण करने वाली इस विडंबना से हममें से हर एक को बाहर निकल आना चाहिए कि ईश्वर एक व्यक्ति है और वह कुछ पदार्थ अथवा प्रशंसा का भूखा है, उसे रिश्वत या खुशामद का प्रलोभन देकर उल्लू बनाया जा सकता और मनोकामना तथा स्वर्ग-मुक्ति की आकांक्षाएँ पूरी करने के लिए लुभाया जा सकता है।* इस अज्ञान में भटकता हुआ जनसमाज अपनी बहुमूल्य शक्तियों को निरर्थक विडंबनाओं में बरबाद करता रहता है। *वस्तुतः "ईश्वर" एक शक्ति है जो अंतश्चेतना के रूप में सद्गुणों और सत्प्रवृत्तियों के रूप में हमारे अंतरंग में विकसित होती है।* ईश्वरभक्ति का रूप पूजा-पत्री की टंट-घंट नहीं विश्वमानव के भावनात्मक दृष्टि से समुन्नत बनाने का प्रबल पुरुषार्थ ही हो सकता है। देवताओं की प्रतिमाएँ तो ध्यान के मनोवैज्ञानिक व्यायाम की आवश्यकता पूर्ति करने की धारणा मात्र है। वस्तुतः जैसे देवी-देवता मूर्तियों और चित्रों में अंकित किए गए हैं, उनका अस्तित्व कहीं भी नहीं है। उच्च भावनाओं का आलंकारिक रूप ही ईश्वर के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। *ऋतंभरा प्रज्ञा को ही सरस्वती कहते हैं।*
👉 मन को साधने के लिए ही उसकी आलंकारिक छवि विनिर्मित की गई है। *वस्तुतः अंतरंग में समुन्नत सद्ज्ञान ही सरस्वती है।* इस तथ्य को समझे बिना अध्यात्म भी कोई जाल-जंजाल ही सिद्ध होगा और मनुष्य आत्मप्रवंचना से भटकाकर उसकी उस शक्तियों में बरबाद कर देगा जो लोकमंगल की दिशा में प्रयुक्त होने पर व्यक्ति और समाज की भारी हित साधना कर सकती थी। *हमारा परामर्श है कि परिजन कल्पित ईश्वर की खुशामद में बहुत सिर न फोड़े। अपने अंतरंग को और विश्वमानव को समुन्नत करने के प्रयत्नों में जुट जाएँ और उस त्याग-बलिदान को वास्तविक ईश्वरभक्ति तथा तपश्चर्या समझें।* इस प्रक्रिया को अपनाकर ईश्वरीय अनुग्रह जल्दी प्राप्त कर सकेंगे। *पूजा-उपासना क मूल प्रयोजन अंतरंग पर चढ़े हुए मलावरण विक्षेपों पर साबुन लगाकर अपने ज्ञान और कर्म को अधिकाधिक परिष्कृत करन भर है।* ईश्वर को न किसी की खुशामद पसंद है और न धूप- दीप बिना उसका कोई काम रुका पड़ा है। *व्यक्तित्व को परिष्कृत और उदार बनाकर ही हम ईश्वरीय अनुग्रह के अधिकारी बन सकते हैं।* इस तथ्य को हमारा हर परिजन हृदयंगम करले तो वह मंत्र-तंत्र में उलझा रहने की अपेक्षा उस दिशा में बहुत दूर तक चल सकता है जिससे कि विश्व-कल्याण और ईश्वरीय-प्रसन्नता के दोनों आधार अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*अखण्डज्योति जून १९७१ पृष्ठ-५७*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
https://youtu.be/E-WGhFLmLgo
![]() |
| Gayatri pariwar images |
🌺 ऋषि चिंतन से 192🌺 Rishi chintan se 192🌺
*🥀 ०८ अगस्त २०२३ मंगलवार 🥀*
*〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
*❗//➖द्वितीय श्रावण➖//❗*
*🌒 कृष्णपक्ष षष्ठी २०८० 🌘*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*सतत कर्म करना ही हमारी पहचान हो*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *ईश्वर की सबसे बड़ी देन, सबसे महत्त्वपूर्ण प्रसाद है- "अपने मस्तिष्क को विकृतियों से रिक्त बनाइए, उसमें विवेक एवं सद्बुद्धि का दीप प्रज्वलित कीजिए, उसको निर्माण की दिशा में लगाइए और देखिए कि आपका निर्विकार मस्तिष्क आपको कैसी- कैसी सृजनात्मक योजनाएँ प्रदान करता है और किस प्रकार आपका मार्गदर्शन करता एवं प्रहरी की तरह आपको बचाए भी रखता है।* कार्य को आरंभ कर देने पर अनेक विघ्न-बाधाएँ दिखाई पड़ती हैं, परंतु विघ्नों से डरकर कार्य को अधूरा छोड़ना, भीरू प्रकृति का परिचायक है। ऐसे व्यक्ति किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। *मनुष्य वह है जो बाधारूपी चट्टानों को तोड़कर गिरा देता है। कार्य तो वह है जिसमें बाधाएँ आएँ और कर्मवान वह है जो ऐसे ही कार्यों को करे जिनमें बाधाएँ आ-आकर उसे सफलता के द्वार की ओर दृढ़ता से धकेल दे।* इसलिए बाधाओं का स्वागत करिए, वे आपको सफलता का रहस्य समझाएँगी।
👉 सूर्य, चाँद, तारे अपने कर्ममय गति-चक्र में कभी कोई बाधा नहीं आने देते। *अपने कर्ममय अवसान और फिर उदय में ही उनके अस्तित्व का बोध और सार्थकता है।* नदी का कर्म है- रास्ते में आने वाले स्थानों को सींचते, हरियाली बाँटते हुए निरंतर बहते रहना। *जब जड़ प्रकृति और उसके विभिन्न रूपों का यह हाल और नियम है, तब भला सजीव-सचेतन मनुष्य कर्महीन कैसे रह सकता है ?* जीवन और प्रकृति के इन रूपों, नियमों और रहस्यों को समझ- बूझकर ही कवि ने इस तथ्य को उजागर किया है कि *"कर्म प्रधान विश्व रचि राखा"* अर्थात् इस जगत में कर्म करते रहना ही जीवन का चरम सत्य है। *संसार की रचना ही वास्तव में कर्म करने के लिए की गई है।* संसार में सुखों का अधिकारी केवल कर्मवीर व्यक्ति ही हुआ करता है, कर्म से जी चुराने वाला कभी नहीं। *कहावत है कि "चलने वाला ही कहीं पहुँच पाता है, राह के किनारे बैठा रहने वाला नहीं।"* सागर की गहराई में उतरकर गोता लगाने वाला भीतर से मोती निकालकर बाहर ला सकता है। जो व्यक्ति अपने आत्मबल पर भरोसा नहीं करते और साधनों को सर्वोपरि मानते हैं, वे संसार में कुछ कर सकेंगे, इस पर विश्वास नहीं होता।
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*सफल जीवन की दिशा धारा पृष्ठ-८५*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
https://youtu.be/l1vpJneBDM4
![]() |
| Gayatri pariwar images |
🌺 ऋषि चिंतन से 193🌺 Rishi chintan se 193🌺
*🥀 ०९ अगस्त २०२३ बुधवार 🥀*
*〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
*❗//➖द्वितीय श्रावण➖//❗*
*🌒 कृष्णपक्ष सप्तमी २०८०🌘*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*➖ आत्मबल जागृत कीजिए➖*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 हमें जानना चाहिए कि मनुष्य केवल एक शरीर मात्र ही नहीं है। *उसमें एक परम तेजस्वी "आत्मा" भी विद्यमान है।* हमें जानना चाहिए कि मनुष्य केवल धन, बुद्धि और स्वास्थ्य के भौतिक बलों से ही सांसारिक सुख, संपदा, समृद्धि एवं प्रगति प्राप्त नहीं कर सकता, *उसे "आत्मबल" की भी आवश्यकता है।* आत्मा के अभाव में शरीर की कीमत दो कौड़ी की भी नहीं रहती । *इसी प्रकार "आत्मबल" के अभाव में शरीर बल मात्र खिलवाड़ बनकर रह जाता है।* वह किसी के पास कितनी ही बड़ी मात्रा में क्यों न हों, उससे सुखानुभूति नहीं मिल सकती। वे केवल भार तनाव, चिंता एवं उद्वेग का कारण बनेंगे और *यदि कहीं उनका दुरुपयोग होने लगा, तब तो सर्वनाश की भूमिका ही सामने लाकर खड़ी कर देंगे।*
👉 *"आदर्शों" और "सिद्धांतों" पर अड़े रहने, किसी भी प्रलोभन और कष्ट के दबाव में कुमार्ग पर पग न बढ़ाने, अपने आत्मगौरव के अनुरूप सोचने और करने, दूरवर्ती भविष्य के निर्माण के लिए आज की असुविधाओं को धैर्य और प्रसन्नचित्त से सह सकने की दृढ़ता का नाम "आत्मबल" है।* जो वासना और तृष्णा को, स्वार्थ और सुविधा को ठोकर मारकर अपने लिए नहीं, लोकमंगल के लिए सदाचार से भरा प्रेम और आत्मीयता भरा जीवन जी सकता है, उस महामानव को ही आत्मबल संपन्न कहा जाएगा। *चरित्र के धनी, करुणा, दया से परिपूर्ण हृदय, उदारता और आत्मीयता से ओत- प्रोत व्यक्तित्व "आत्मबल" के ही प्रतीक हैं।* संसार उनकी उपस्थिति से सुगंधित, सुरभित, समुन्नत और व्यवस्थित होता है। वे अपनी सामर्थ्य से दिशाएँ बदलने और हवाएँ पलटने में समर्थ होते हैं। *"आत्मबल" वह क्षमता है, जिसका जितना अंश मनुष्य के पास होगा, उतना ही वह अपने विवेक को सजग कर सकने में समर्थ होगा।* विवेक ही वह सत्ता है जो धन, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की भौतिक शक्तियों को नियंत्रण में रखकर उन्हें सन्मार्गगामी बनाती है, सदुद्देश्य और सत्प्रयोजनों में प्रवृत्त करती है।
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*सफल जीवन की दिशा धारा पृष्ठ-८९*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
https://youtu.be/KlqMlFDmUQM
![]() |
| Aatma ki pavitrata |
🌺 ऋषि चिंतन से 194🌺 Rishi chintan se 194🌺
*🥀 १० अगस्त २०२३ गुरुवार 🥀*
*〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
*❗//➖द्वितीय श्रावण➖//❗*
*🌒 कृष्णपक्ष नवमी २०८०🌘*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*"आत्मसुधार" व "आत्मविश्वास"*
*➖❗उत्कृष्ट मानवीय गुण❗➖*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *पुरुषार्थों में सबसे बड़ा पुरुषार्थ अपने गुण, कर्म, स्वभाव को जी भरकर सुसंस्कृत बनाना है।* जिसने अपने को सुधार लिया, उसकी सारी उलझनें सुलझ जाती हैं। *जिसने अपना निर्माण कर लिया, उसके लिए ही हर क्षेत्र में सफलता हाथ बाँधे खड़ी होगी। उन्नति और सुख-समृद्धि के लिए आकांक्षा करना उचित है, पर इसके लिए आवश्यक क्षमता एवं योग्यता को जुटाना भी आवश्यक है। बाह्य परिस्थितियों में चाहे जितनी ही अनुकूलता क्यों न हो, पर व्यक्ति यदि भीतर से खोखला है, तो उसे प्रतिकूलता का ही सामना करना पड़ेगा। इसलिए अभीष्ट मार्ग पर सफलता प्राप्त करने के लिए बाह्य उपकरण जुटाने के साथ-साथ आंतरिक सुधार के लिए भी प्रयत्नशील रहना चाहिए। यह भूल नहीं जाना चाहिए कि दुर्गुणी व्यक्ति कोई क्षणिक सफलता भले ही प्राप्त कर ले, उसे अंततः असफल ही रहना पड़ता है।
👉 *संसार के समस्त अग्रणी लोग आत्मविश्वासी वर्ग के होते हैं।* अपनी आत्मा में, अपनी शक्तियों में आस्थावान रहकर कोई भी कार्य कर सकने का साहस रखते हैं और जब भी जो भी कार्य अपने लिए चुनते हैं, पूरे संकल्प और पूरी लगन के साथ उसे पूरा करके छोड़ते हैं। वे मार्ग में आने वाली किसी भी बाधा अथवा अवरोध से विचलित नहीं होते। आशा, साहस, उद्योग उनके स्थायी साथी होते हैं। किसी भी परिस्थिति में वह उनको पास से जाने नहीं देते। *आत्मविश्वासी सराहनीय कर्मवीर होता है। वह अपने लिए ऊँचा उद्देश्य चुन ही लेता है।* हेयता, दीनता अथवा निकृष्टता उसके पास फटकने नहीं पाती। *नित्य नए उत्साह से अपने कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर होता है, नए-नए प्रयत्न और प्रयोग करता प्रतिकूलताओं और प्रतिरोधों से बहादुरी के साथ टक्कर लेता और है, अंत में विजयी होकर श्रेय प्राप्त कर ही लेता है।*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*सफल जीवन की दिशा धारा पृष्ठ-९०*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
https://youtu.be/yOOdt73AUzQ
![]() |
| Shraddha aur vishwas |
🌺 ऋषि चिंतन से 195🌺 Rishi chintan se 195🌺
*🥀 ११ अगस्त २०२३ शुक्रवार 🥀*
*〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
*❗//➖द्वितीय श्रावण➖//❗*
*🌒 कृष्णपक्ष दशमी २०८०🌘*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*विचारक्रांति पर ध्यान एकाग्र करें*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 हमारा परामर्श यह है कि *"पुण्य-परमार्थ"* की अन्तश्चेतना यदि मन में जागे तो उसे सस्ती वाहवाही लूटने की मानसिक दुर्बलता से टकराकर चूर-चूर न होने दिया जाए । *आमतौर से लोगों की ओछी प्रवृत्ति "नामवरी" लूटने का ही दूसरा नाम पुण्य मान बैठती है और ऐसे काम करती है, जिनकी वास्तविक उपयोगिता भले ही नगण्य हो, पर उनका विज्ञापन अधिक हो जाए।* मंदिर, धर्मशाला बनाने आदि प्रयत्नों को हम इसी श्रेणी का मानते हैं। वे दिन लद गए जबकि मंदिर जनजाग्रति के केंद्र रहा करते थे। वे परिस्थितियाँ चली गई जब धर्मप्रचारकों और पैदल यात्रा करने वाले पथिकों के लिए विश्रामगृहों की आवश्यकता पड़ती थी। अब व्यापारिक या शादी-ब्याह संबंधी स्वार्थपरक कामों के लिए लोगों को किराया देकर ठहरना या ठहराना ही उचित है। मुफ्त की सुविधा वे क्यों लें और क्यों दें। कहने का तात्पर्य यह है कि इस तरह के विडंबनात्मक कामों से शक्ति का अपव्यय बचाया जाना चाहिए और उसे जनमानस के परिष्कार कर सकने वाले कार्यों की एक ही दिशा में लगाया जाना चाहिए। *हमें नोट कर लेना चाहिए कि आज की समस्त उलझनों और विपत्तियों का मात्र एक ही कारण है- "मनुष्य की विचार विकृति।"*
👉 दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों ने ही शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, राजनीतिक संकट खड़े किए हैं। बाह्य उपचारों से पत्ते सींचने से कुछ बन नहीं पड़ेगा, हमें मूल तक जाना चाहिए और जहाँ से संकट उत्पन्न होते हैं, उस छेद को बंद करना चाहिए। *कहना न होगा कि विचारों और भावनाओं का स्तर गिर जाना ही समस्त संकटों का केंद्रबिंदु है।* हमें इसी मर्मस्थल पर तीर चलाने चाहिए। *हमें "ज्ञानयज्ञ" और "विचार-क्रांति" को ही इस युग की सर्वोपरि आवश्यकता एवं समस्त विकृतियों की एक मात्र चिकित्सा मानकर चलना चाहिए और उन उपायों को अपनाना चाहिए जिनसे मानवीय विचारणा एवं आकांक्षा को निकृष्टता से विरत कर उत्कृष्टता का स्तर उन्मुख किया जा सके।* ज्ञानयज्ञ की सारी योजना इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर बनाई गई है।
👉 *हमें अर्जुन को लक्ष्य भेदते समय मछली की आँख देखने की तरह केवल युग की आवश्यकता "विचार-क्रांति" पर ही ध्यान एकत्रित करना चाहिए और केवल उन्हीं परमार्थ प्रयोजनों को हाथ में लेना चाहिए, वही ज्ञानयज्ञ के पुण्य-प्रयोजन पूरा कर सकेगा।* अन्यान्य कार्यक्रमों से हमें अपना मन बिलकुल हटा लेना चाहिए, शक्ति बखेर देने से कोई काम पूरा नहीं हो सकता। *हमारा परामर्श परिजनों को यही है कि वे परमार्थ भावना से सचमुच कुछ करना चाहते हों तो उस कार्य को हजार बार इस कसौटी पर कस लें कि इस प्रयोग से आज की मानवीय दुर्बुद्धि को उलटने के लिए अभीष्ट प्रबल पुरुषार्थ की पूर्ति होती है या नहीं।* शारीरिक सुख-सुविधाएँ पहुँचाने वाले धर्म-पुण्यों को अभी कुछ समय रोका जा सकता है, वे पीछे भी हो सकते हैं, पर आज की तात्कालिक आवश्यकता तो विचार-क्रांति एवं भावनात्मक नवनिर्माण ही है, सो उसी को आपत्तिधर्म-युगधर्म मानकर सर्वतोभावेन हमें उसी प्रयोजन में निरत हो जाना चाहिए । *"ज्ञानयज्ञ" के कार्य इमारतों की तरह प्रत्यक्ष नहीं दीखते और स्मारक की तरह वाहवाही का प्रयोजन पूरा नहीं करते तो भी उपयोगिता की दृष्टि से ईंट-चूने की इमारतें बनाने की अपेक्षा इन भावनात्मक परमार्थों का परिणाम लाख-करोड़ गुना अधिक है।* हमें वाहवाही लूटने की तुच्छता से आगे बढ़कर वे कार्य हाथ में लेने चाहिए जिनके ऊपर मानवजाति का भाग्य और भविष्य निर्भर है। *यह प्रक्रिया ज्ञानयज्ञ का "होता"—"अध्वर्यु" बने बिना और किसी तरह पूरी नहीं होती ।*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*अखण्डज्योति जून १९७१पृष्ठ-५८-५९*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
https://youtu.be/xL_rJNWVJTM





