प्रेरणादायक कहानियां भाग 69 prernadayak kahaniyan part 69







💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 341 💮




*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*

*💐💐अतुलनीय रिश्ता💐💐*

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दिसंबर की कड़ाके की ठिठुरा देने वाली ठंड.... ऐसे मे दिल्ली तक के सफ़र में रात मे ट्रेन में सब अपने अपने गर्म लिहाफ़ मे दुबके थे....

श्रवण भी अपनी सीट पर बस दुबकने की ही तैयारी कर रहा था। सोने से पूर्व एक बार फ्रेश होने के इरादे से वो वॉशरूम की तरफ़ गया।

वॉशरूम के बाहर की ओर दरवाजे के सामने एक अधेड़ उम्र की महिला एक छोटा सा थैला लिए बैठी थी... शायद उसमें उसका सामान था।

गर्म कपड़ों के नाम पर मात्र एक पतला सा शॉल ओढ़े हुए थी...जो ठंड से राहत देने के लिए काफ़ी नही थी...श्रवण ने देखा...महिला की आँखों में आँसू की बूंदें थी..जो बार बार गालों पर लुढ़क जाती.. और महिला शॉल से उसे पौंछ देती...

तभी बाजू वाले ट्रैक पर कोई ट्रेन गुज़री.....उससे आती हवा में वह महिला सिहर उठी....कंप-कंपा कर स्वयं को स्वयं मे लपेटने का प्रयास करने लगी।

"कहाँ जा रहीं हैं आप...."अचानक श्रवण ने पूछ लिया।
महिला ने चेहरा ऊपर किया... श्रवण को देखा।
"मथुरा...."महिला ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
 
"टिकट नहीं लिया...."श्रवण ने पूछा।
"बेटा... अचानक जाना पड़ रहा है... टीसी आएगा... तो ले लूंगी..."महिला ने आँसू पोंछते हुए कहा।

"क्यों... ऐसे अचानक क्यों.... इतनी ठंड में.... आपको रिजर्वेशन करवाना चाहिए था..."पता नही क्यों पर श्रवण को उस महिला से एक जुड़ाव सा महसूस हो रहा था।

"बेटा....अभी पता चला कि मेरी बेटी प्रसव के दौरान चल बसी.."कहते कहते महिला फ़फक पड़ी।

"ओह.... तो आप अकेली.... परिवार का कोई और सदस्य..." श्रवण ने कुछ पूछना चाहा।

"कोई भी नहीं है... हम माँ बेटी ही एक दूसरे का सहारा थीं... अभी साल हुआ... बिटिया का ब्याह किया था...."महिला सिसकती हुई बोली।

इतने में टीसी आ गया।श्रवण महिला की मनःस्थिति बखूबी समझ रहा था, उसने महिला का टिकट बनवाया और उसे सीट पर बैठाकर.... अपना एक कंबल निकालकर उसे औढाया....
   
महिला अचरच भरी निगाहों से बस उसे देखती रही... बेचारी कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थी...उसे तो श्रवण के रूप में जैसे स्वयं ईश्वर मिल गए थे।

"मांजी.... आप ये हज़ार रुपये अपने पास रखें... और अपना पता मुझे नोट करवा दीजिए.... और फिर कभी ऐसा मत कहिएगा कि आपका इस दुनिया में कोई नहीं.... ये आपका बेटा है न...

हर महीने जितना भी संभव हो.... पैसे भेजेगा... और जब कभी मौका लगेगा... मैं आपसे मिलने भी आऊंगा.... मांजी मैं आप पर कोई उपकार नही कर रहा हूँ.... मुझे भी आपके रूप में माँ मिली है...."कहकर श्रवण ने महिला के चरण स्पर्श कर लिए।

महिला की आँखों से अविरल अश्रुधार प्रवाहित हो रही थी....

 उसे सबकुछ स्वप्न की तरह प्रतीत हो रहा था....।

महिला कंबल औढ़े चुपचाप लेटी श्रवण को निहार रही थी और श्रवण वॉलेट मे लगे अपनी माँ की तस्वीर को देख रहा था.....।

कड़ाके की ठंड में जहाँ लोग अपने अपने बिस्तरों मे दुबके हुए थे.....वहाँ अपने पन के गर्म लिहाफ से ज़िंदगी के सफ़र मे एक अतुलनीय रिश्ता वज़ूद ले चुका था।


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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 342 💮


*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐सास नाम का ख़ौफ़💐💐*

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बर्तन गिरने की आवाज़ से शिखा की आँख खुल गयी। घड़ी देखी तो आठ बज रहे थे , वह हड़बड़ा कर उठी।

“उफ़्फ़ ! मम्मी जी ने कहा था कल सुबह जल्दी उठना है , ””””रसोई”””” की रस्म करनी है, हलवा-पूरी बनाना है… और मैं हूँ कि सोती ही रह गयी। अब क्या होगा…! पता नहीं, मम्मी जी, डैडी जी क्या सोचेंगे, कहीं मम्मी जी गुस्सा न हो जाएँ। हे भगवान!”

उसे रोना आ रहा था। ””””ससुराल”””” और ””””सास”””” नाम का हौवा उसे बुरी तरह डरा रहा था। कहा था दादी ने-
””””””””ससुराल है, ज़रा संभल कर रहना। किसी को कुछ कहने मौका न देना, नहीं तो सारी उम्र ताने सुनने पड़ेंगे। सुबह-सुबह उठ जाना, नहा-धोकर साड़ी पहनकर तैयार हो जाना, अपने सास-ससुर के पाँव छूकर उनसे आशीर्वाद लेना। कोई भी ऐसा काम न करना जिससे तुम्हें या तुम्हारे माँ-पापा को कोई उल्टा-सीधा बोले। ”
शिखा के मन में एक के बाद एक दादी की बातें गूँजने लगीं थीं।

किसी तरह वह भागा-दौड़ी करके तैयार हुई। ऊँची-नीची साड़ी बाँध कर वह बाहर निकल ही रही थी कि आईने में अपना चेहरा देखकर वापस भागी-न बिंदी, न सिन्दूर -आदत नहीं थी तो सब लगाना भूल गयी थी। ढूँढकर बिंदी का पत्ता निकाला। फिर सिन्दूरदानी ढूँढने लगी…. जब नहीं मिली तो लिपस्टिक से माथे पर हल्की सी लकीर खींचकर कमरे से बाहर आई।

जिस हड़बड़ी में शिखा कमरे से बाहर आई थी, वह उसके चेहरे से, उसकी चाल से साफ़ झलक रही थी। लगभग भागती हुई सी वह रसोई में दाख़िल हुई और वहाँ पहुँचकर ठिठक गयी। उसे इस तरह हड़बड़ाते हुए देखकर सासू माँ ने आश्चर्य से उसकी तरफ़ देखा। फिर ऊपर से नीचे तक उसे निहारकर धीरे से मुस्कुराकर बोलीं,
“आओ बेटा! नींद आई ठीक से या नहीं ?”
 अचकचाकर बोली,”जी मम्मी जी! नींद तो आई, मगर ज़रा देरी से आई, इसीलिए सुबह जल्दी आँख नहीं खुली …सॉरी…. ” बोलते हुए उसकी आवाज़ से डर साफ़ झलक रहा था।

सासू माँ बोलीं, ” कोई बात नहीं बेटा! नई जगह है… हो जाता है !”
शिखा हैरान होकर उनकी ओर देखने लगी, फिर बोली,
“मगर…मम्मी जी, वो हलवा-पूरी?”
सासू माँ ने प्यार से उसकी तरफ़ देखा और पास रखी हलवे की कड़ाही उठाकर शिखा के सामने रख दी, और शहद जैसे मीठे स्वर में बोलीं,
“हाँ! बेटा! ये लो! इसे हाथ से छू दो!”
शिखा ने प्रश्नभरी निगाहों से उनकी ओर देखा।

उन्होंने उसकी ठोड़ी को स्नेह से पकड़ कर कहा, “बनाने को तो पूरी उम्र पड़ी है! मेरी इतनी प्यारी, गुड़िया जैसी बहू के अभी हँसने-खेलने के दिन हैं, उसे मैं अभी से किचेन का काम थोड़ी न कराऊँगी। तुम बस अपनी प्यारी- सी, मीठी मुस्कान के साथ सर्व कर देना -आज की रस्म के लिए इतना ही काफ़ी है।”
सुनकर शिखा की आँखों में आँसू भर आए।

 वह अपने-आप को रोक न सकी और लपक कर उनके गले से लग गई ! उसके रुँधे हुए गले से सिर्फ़ एक ही शब्द निकला – माँ ।

*💐💐शिक्षा💐💐*
दोस्तों, जितना हो सके ससुराल में भी बहुओं को डराना बंध हो जाये तो ये संसार स्वर्ग बन जाये।।।सास नाम का ख़ौफ़ हर स्त्री के दिल मे घर कर चुका है,इसे आपसी प्यार औऱ सामंजस्य से दूर किया जा सकता है।।

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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 343 💮


*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐सोने के सिक्कों का थैला💐💐*

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रोहन एक लालची और स्वार्थी आदमी था। वह हमेशा बहुत सारी संपत्ति पाने की चाहत रखता था और पैसा कमाने के लिए दूसरों को धोखा देने से कभी नहीं हिचकिचाता था। इसके अलावा, वह कभी भी दूसरों के साथ कुछ भी साझा नहीं करना चाहते थे। वह इतना स्वार्थी था कि वह हर चीज़ पर अपना कब्ज़ा जमाना चाहता था। स्वार्थी आदमी हर छोटी-छोटी बात का हिसाब-किताब करता रहता था। वह अपने नौकरों को बहुत कम वेतन देता था। वह जहां भी जाता, दूसरों को धोखा देकर पैसे बचाने के लिए खूब हिसाब-किताब करता। उसने अपनी संपत्ति की रक्षा के लिए बहुत सारे झूठ भी बोले। सीधे शब्दों में कहें तो रोहन ईमानदारी शब्द का विपरीतार्थी शब्द था।

https://youtu.be/I7Z6A0AuuL8?si=gIl7S2daHokkTkPa

हालाँकि, उसे अपने ही कृत्य से एक अच्छा सबक सिखाया गया।

एक दिन, उसका एक छोटा बैग छूट गया, जिसमें 50 सोने के सिक्के थे। वह दिन-रात सोने के सिक्कों की थैली ढूंढ रहा था। उन्होंने अपने कर्मचारियों को बैग की तलाश में भेजा, लेकिन किसी को बैग नहीं मिला। उसने अपने दोस्तों और पड़ोसियों को बताया कि उसने सोने के सिक्कों का एक बैग खो दिया है और उनसे अनुरोध किया कि अगर उन्हें यह मिले तो वे सूचित करें। रोहन इतना दुखी था कि उसने इतने सारे सोने के सिक्के खो दिए थे।

कुछ दिनों के बाद, रोहन के घर के पास रहने वाली एक दस वर्षीय लड़की ने अपने पिता को बताया कि उसे एक छोटा बैग मिला है और उसमें 50 सोने के सिक्के हैं। उसके पिता रोहन की ज़मीन पर काम करते थे। उसने अपनी बेटी को बताया कि यह उसके मुखिया का पैसा था और उसने दो दिन पहले इसे खो दिया था और कहा कि वह बैग अपने मालिक को लौटा देगा। वे बहुत अमीर नहीं थे और पिता सोने के सिक्के अपने पास रख सकते थे और बैग मिलने की बात छिपा सकते थे। वह इतना ईमानदार था कि उसे मूल्यवान सिक्के अपने मालिक को लौटा देने चाहिए, जो वास्तव में इसका कर्ज़दार था।

https://youtu.be/I7Z6A0AuuL8?si=gIl7S2daHokkTkPa

उसने इसे अपने मालिक रोहन को वापस दे दिया और उससे जांच करने के लिए कहा कि बैग में 50 सोने के सिक्के हैं या नहीं। रोहन, जो सिक्के पाकर सचमुच खुश था, ने एक चाल खेलने का फैसला किया। वह अपने कर्मचारी पर चिल्लाया, 'इस थैले में 75 सोने के सिक्के थे और तुमने मुझे केवल 50 दिए! अन्य सिक्के कहाँ हैं? तुमने उन्हें चुरा लिया है!'

यह सुनकर मजदूर हैरान रह गया और उसने अपने मालिक से विनती की कि उसकी बेटी को जो कुछ भी मिला हो वह दे दे। स्वार्थी और लालची रोहन को यह स्वीकार नहीं हुआ और उन्होंने सही निर्णय पाने के लिए इस मुद्दे को अदालत में ले जाने का फैसला किया। जज ने दोनों पक्षों को सुना. उन्होंने बेटी और कार्यकर्ता से जांच की कि उन्हें बैग में कितने सिक्के मिले और उन्होंने आश्वासन दिया कि यह केवल 50 थे!

उन्होंने रोहन से जिरह की और रोहन ने जवाब दिया, 'हां भगवान, मेरे बैग में 75 सोने के सिक्के थे और अब उन्होंने मुझे केवल 50 ही दिए हैं! उन्होंने मेरे 25 सिक्के चुरा लिए हैं!'
जज ने पूछा, 'क्या तुम्हें यकीन है कि तुम्हारे पास 75 सिक्के थे?' और रोहन ने सिर हिलाया।

फिर जज ने अपना फैसला सुनाया, 'चूंकि रोहन ने 75 सोने के सिक्कों से भरा एक बैग खो दिया था, लड़की को जो बैग मिला था, जिसमें केवल 50 सिक्के थे, वह रोहन का नहीं है और इसे किसी और ने खो दिया है। इसके अलावा, अगर किसी को 75 सोने के सिक्कों का बैग मिला, तो मैं घोषित कर दूंगा कि यह रोहन का है। साथ ही, 50 सिक्कों के नुकसान के खिलाफ कोई दावा नहीं किया गया और मैं लड़की और उसके पिता को उनकी ईमानदारी की सराहना के प्रतीक के रूप में उन 50 सिक्कों को लेने का आदेश देता हूं!'

*शिक्षा:* ईमानदारी को पुरस्कृत किया जाता है और लालच को दंडित किया जाता है!

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*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐एक कदम और सफलता💐💐* 

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पहाड़ी प्रदेश में एक छोटा सा गांव था। इस गांव में धीरज नामका एक बच्चा रहा करता था। इस गांव के पासवाले एक पहाड़ पर एक बहुत ही प्रसिद्ध एक मंदिर था। इस मंदिर में देशविदेश से कई यात्री दर्शन करने आते थे। वो आते थे तब काफी थके हुए, निराश और दुखी नजर आते थे लेकिन लौटते समय उनके चेहरे पर खुशी होती थी या एक नई उम्मीद होती थी कि उनकी प्रॉब्लम्स जरूर दूर हो जाएगी।
धीरज के घर से ये मंदिर सिर्फ कुछ किलोमीटर की दूरी पर था लेकिन वो कभी भी इस मंदिर में नहीं गया था! वो सोचता था कि मंदिर इतनी नजदीक तो है वो जब चाहे वहां जा सकता है। उसकी इसी सोच के चलते कई साल बीत गए वो युवा और फिर प्रौढ अवस्था में भी आ गया लेकिन फिर भी वो मंदिर नही पहुंचा। 
उसके जीवन का सबसे कठिन दौर शुरू हुवा तो वो सोचने लगा की पूरी दुनिया से लोग इस मंदिर आकर अपनी परेशानियां दूर करते है और वो है जो अब तक इतना नजदीक होने के बाद भी मंदिर की कृपा नही ले पाया। इस विचार से वो सो नही पा रहा था। 

https://youtu.be/Ig7M-e8LSrU?si=dxskvcx7ZyhiDnlo

पता नही उसे क्या सूझा कि रात को 2 बजे अपनी चार्जेबल टॉर्च लेकर वो मंदिर की और निकल पड़ा। वह जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया अंधेरा और भी घना होता गया। एक समय ऐसा आया जब अंधेरा इतना घना हो गया कि उसके बैटरी की रोशनी से तीन चार कदम दूर कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा था। उसने सोचा सुबह होने के बाद जब रोशनी बढ़ जाएगी तब वह मंदिर चला जाएगा। ऐसा सोचकर वह एक जगह देखकर वहां पर बैठ गया। 
धीरज वहां बैठकर सुबह होने का इंतजार कर रहा था तब उसने दूर से एक आदमी की परछाई अपने तरफ आते दिखी थोड़ी देर बाद जब वो आदमी करीब आया तो उसे टार्च की रोशनी में साफ साफ दिखाई दिया कि वह एक बूढ़ा आदमी था जो एक लकड़ी के सहारे और दूसरे हाथ में एक छोटा सा दिया लेकर चले जा रहा था। धीरज को उस बूढ़े आदमी को देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। धीरज ने बूढ़े आदमी के थोड़ा पास जाकर उनसे पूछा कि वह कहां जा रहे हैं? आदमी ने कहा कि वह पहाड़ वाले मंदिर पर दर्शन के लिये जा रहा है। धीरज बोला की आप इस छोटे से दिए के भरोसे जिससे आपको सिर्फ एक कदम तक की दूरी ही दिखाई देती है भला कैसे इतने दूर मंदिर का सफर तय कर सकते हैं?
बूढ़े आदमी ने जो कहा वह सुनकर धीरज की जिंदगी भर की सोच बदल गई। बूढ़े ने कहा उतना ही तो काफी है! मुझे सिर्फ एक कदम दूर दिखाई दे उतना काफी है। मैं एक कदम आगे बढूंगा तो और अगला एक कदम मुझे दिखाई देगा और इस तरह एक-एक कदम करके मैं मंदिर तक पहुंच जाऊंगा। एक कदम से ज्यादा कोई इस दुनिया में देख पाया है भला?
बूढ़े आदमी की बात सुन धीरज अब अपने स्वयं के विचारों से तुलना कर रहा था ।

दोस्तों, 
हमें जीवन में कहीं भी पहुंचने के लिए, 
किसी भी क्षेत्र में कामयाब होने के लिए 
 *सिर्फ और सिर्फ एक कदम उठाना काफी है।* 
 *हम उस दिशा में एक कदम बढ़ाएंगे तो अगला कदम हमें अपने आप दिखाई दे जाएगा* । 
 *हम एक दरवाजा खोलेंगे तो कई दरवाजे अपने आप खुल जाएंगे।* 

 *चिंतन कीजिये।* 


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*💐💐अपने पराए💐💐* 

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फ़ोन की घंटी तो सुनी मगर आलस की वजह से रजाई में ही लेटी रही। उसके पति राहुल को आखिर उठना ही पड़ा। दूसरे कमरे में पड़े फ़ोन की घंटी बजती ही जा रही थी ।

इतनी सुबह कौन हो सकता है जो सोने भी नहीं देता, इसी चिड़चिड़ाहट में उसने फ़ोन उठाया। “हेल्लो, कौन” तभी दूसरी तरफ से आवाज सुन सारी नींद खुल गयी।

“नमस्ते पापा।” “बेटा, बहुत दिनों से तुम्हे मिले नहीं सो हम दोनों 11 बजे की गाड़ी से आ रहे है। दोपहर का खाना साथ में खा कर हम 4 बजे की गाड़ी वापिस लौट जायेंगे। ठीक है।” “हाँ पापा, मैं स्टेशन पर आपको लेने आ जाऊंगा।”
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फ़ोन रख कर वापिस कमरे में आ कर उसने सुनिता को बताया कि मम्मी पापा 11 बजे की गाड़ी से आ रहे है और दोपहर का खाना हमारे साथ ही खायेंगे ।

रजाई में घुसी सुनिता का पारा एक दम सातवें आसमान पर चढ़ गया। “कोई इतवार को भी सोने नहीं देता, अब सबके के लिए खाना बनाओ। पूरी नौकरानी बना दिया है।” गुस्से से उठी और बाथरूम में घुस गयी। राहुल हक्का बक्का हो उसे देखता ही रह गया।

जब वो बाहर आयी तो राहुल ने पूछा “क्या बनाओगी।” गुस्से से भरी सुनिता ने तुनक के जवाब दिया “अपने को तल के खिला दूँगी।”

राहुल चुप रहा और मुस्कराता हुआ तैयार होने में लग गया, स्टेशन जो जाना था।

थोड़ी देर बाद ग़ुस्सैल सुनिता को बोल कर कि वो मम्मी पापा को लेने स्टेशन जा रहा है वो घर से निकल गया। 

सुनिता गुस्से में बड़बड़ाते हुए खाना बना रही थी।

दाल सब्जी में नमक, मसाले ठीक है या नहीं की परवाह किए बिना बस करछी चलाये जा रही थी। कच्चा पक्का खाना बना बेमन से परांठे तलने लगी तो कोई कच्चा तो कोई जला हुआ। आखिर उसने सब कुछ खत्म किया ।

फुरसत की सांस लेते हुए सोफे पर बैठ मैगज़ीन के पन्ने पलटने लगी। उसके मन में तो बस यह चल रहा था कि सारा रविवार खराब कर दिया। बस अब तो आएँ , खाएँ और वापिस जाएँ ।

थोड़ी देर में घर की घंटी बजी तो बड़े बेमन से उठी और दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही उसकी आँखें हैरानी से फटी की फटी रह गयी और मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल सका।

सामने राहुल के नहीं उसके अपने मम्मी पापा खड़े थे जिन्हें राहुल स्टेशन से लाया था। 

मम्मी ने आगे बढ़ कर उसे झिंझोड़ा “अरे, क्या हुआ। इतनी हैरान परेशान क्यों लग रही है।

क्या राहुल ने बताया नहीं कि हम आ रहे हैं।” जैसे मानो सुनिता के नींद टूटी हो “नहीं, मम्मी इन्होंने तो बताया था पर…. रर… रर। चलो आप अंदर तो आओ।” राहुल तो अपनी मुस्कुराहट रोक नहीं पा रहा था। 

कुछ देर इधर उधर की बातें करने में बीत गया।

थोड़ी देर बाद पापा ने कहाँ “सुनिता, गप्पे ही मारती रहोगी या कुछ खिलाओगी भी।” यह सुन सुनिता को मानो साँप सूँघ गया हो। 

क्या करती, बेचारी को अपने हाथों ही से बनाए अध पक्के और जले हुए खाने को परोसना पड़ा। 

मम्मी-पापा खाना तो खा रहे थे मगर उनकी आँखों में एक प्रश्न था जिसका वो जवाब ढूँढ रहे थे। आखिर इतना स्वादिष्ट खाना बनाने वाली उनकी बेटी आज उन्हें कैसा खाना खिला रही है। 

सुनिता बस मुँह नीचे किए बैठी खाना खा रही थी। मम्मी-पापा से आँख मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी। खाना खत्म कर सब ड्राइंग रूम में आ बैठे। 

राहुल - कुछ काम है अभी आता हुँ कह कर थोड़ी देर के लिए बाहर निकल गया।

राहुल के जाते ही मम्मी, जो बहुत देर से चुप बैठी थी बोल पड़ी “क्या राहुल ने बताया नहीं था की हम आ रहे हैं।”

तो अचानक सुनिता के मुँह से निकल गया “उसने सिर्फ यह कहाँ था कि मम्मी पापा लंच पर आ रहे हैं, मैं समझी उसके मम्मी पापा आ रहे हैं।” 

फिर क्या था सुनिता की मम्मी को समझते देर नहीं लगी कि ये मामला है।

बहुत दुखी मन से उन्होंने सुनिता को समझाया “ बेटी, हम हों या उसके मम्मी-पापा तुम्हे तो बराबर का सम्मान करना चाहिए। मम्मी-पापा क्या, कोई भी घर आए तो खुशी खुशी अपनी हैसियत के मुताबिक उसकी सेवा करो। बेटी, जितना किसी को सम्मान दोगी उतना तुम्हे ही प्यार और इज़्ज़त मिलेगी।

जैसे राहुल हमारी इज़्ज़त करता है उसी तरह तुम्हे भी उसके माता-पिता और सम्बन्धियों की इज़्ज़त करनी चाहिए। रिश्ता कोई भी हो, हमारा या उसका, कभी फर्क नहीं करना।”

सुनिता की आँखों में ऑंसू आ गए और अपने को शर्मिंदा महसूस कर उसने मम्मी को वचन दिया कि आज के बाद फिर ऐसा कभी नहीं होगा ।

निश्चित ही हमे विचार करना होगा क्या यह ठीक है क्या यह घटना 10 में से 8 घरों में होती है ?..

हम ही अपने बड़े-बुजुर्गों माता-पिता का सम्मान नही करेंगे तो हमारा सम्मान कौन करेगा हम और आप भी तो एक दिन बूढ़े होंगे तब अगर यही काम हमारे बच्चे हमारे साथ करेंगे तो क्या हमें अच्छा लगेगा ?

नही न ..!

तो आओ हम  सब मिलकर समाज,राष्ट्र,देश ही नही पूरी दुनियां को एक नई दिशा दें जो कि हमारी संस्कृति है 

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