प्रेरणादायक कहानियां भाग 68 prernadayak kahaniyan part 68





💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 336 💮


*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐ससुर के रूप में पिता💐💐*

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"बेटा तू बच्चों का नाश्ता बना इतने मैं इन्हे तैयार कर देता हूं फिर तू वत्सल का लंच लगा दियो मैं इन्हे बस तक छोड़ आऊंगा!" नरेश जी अपनी बहू दिव्या से बोले।

" नहीं नहीं पापा जी मैं कर लूंगी आप बैठिए मैं बस अभी आपकी चाय बनाती हूं!" दिव्या बोली।

" अरे बेटा बन जाएगी चाय मुझे कौन सा कहीं जाना है तू पहले इन सब कामों से फ़्री हो तब तक मैं इन शैतानों को रेडी करता हूं!" नरेश जी हंसते हुए बोले।

दिव्या हैरान थी जो पापा जी मां के रहने पर एक ग्लास पानी खुद नहीं लेते थे आज उनके जाने के पंद्रह दिन बाद ही उसकी हर काम में मदद कर रहे हैं।

असल में दिव्या के परिवार में दिव्या के पति , सास - ससुर और दो बच्चे छः साल का काव्य और तीन साल की आव्या थे। जबसे दिव्या शादी होकर आई उसकी सास ने उसे बेटी की तरह रखा घर के कामों में सहयोग दिया यूं तो दिव्या के ससुर नरेश जी भी बहुत प्यार करते थे उसे पर उसने कभी अपने ससुर को खुद से कोई काम करते नहीं देखा।अभी पंद्रह दिन पहले दिव्या की सास का अचानक हृदय गति रुकने से देहांत हो गया था तब बच्चो की छुट्टियां थी और दिव्या के पति वत्सल ने अवकाश लिया था आज सभी वापिस से जा रहे थे। क्योंकि वत्सल का ऑफिस दूर था तो उसे जल्दी निकलना पड़ता था। और नरेश जी रिटायर हो चुके थे तो घर में ही रहते थे।

" लाओ बेटा बच्चो का दूध दो !" नरेश जी बच्चों को तैयार करके बोले।

बच्चों का दूध और टिफिन दे दिव्या वत्सल का खाना पैक करने लगी साथ साथ उसका नाश्ता भी तैयार कर रही थी और एक गैस पर चाय चढ़ा दी उसने।

" लो वत्सल तुम्हारा नाश्ता पापाजी आपकी चाय... आप नाश्ता तो अभी देर से करोगे!" दिव्या बोली।

" दे ही दो बेटा तुम्हारा भी काम निमटे वरना दुबारा रसोई चढ़ानी पड़ेगी!" नरेश जी बोले।

नरेश जी रोज दिव्या की ऐसे ही मदद करने लगे दिव्या को कभी कभी बुरा भी लगता और वो मना करती पर वो प्यार से उसे कहते कोई बात नहीं बेटा।

"सुनो आप पापाजी से बात करो ना कोई बात है जो उन्हें परेशान कर रही!" एक रात दिव्या वत्सल से बोली।

" क्यों कुछ हुआ क्या पापा ने कुछ कहा तुम्हे!" वत्सल बोला।

" नहीं पर जो इंसान एक ग्लास पानी भी नहीं लेता था खुद से वो मेरे साथ इतने काम कराए कुछ तो गड़बड़ है!" दिव्या बोली।

"अरे तुम्हे कोई परेशानी हो तो तुम खुद पूछ लो ना !" वत्सल बात टालता हुआ बोला।

वत्सल तो सो गया पर दिव्या को नींद नहीं आ रही थी वो उठ कर बाहर आई तो देखा पापा के कमरे की लाईट जल रही है।

" पापाजी आप सोए नहीं अब तक तबियत तो ठीक है आपकी!" दिव्या कमरे का दरवाजा खटखटा कर बोली।

" अरे दिव्या बेटा अंदर आ जाओ ... क्या बात है तुम इस वक़्त जाग रही हो आओ बैठो!" नरेश जी बोले।

" मुझे नींद सी नहीं आ रही थी तो सोचा थोड़ा टहल लूं पर आप क्यों जगे हैं!" दिव्या बोली।

" बस ऐसे ही बेटा मुझे भी नींद नहीं आ रही थी!" नरेश जी बोले।

" पापा आपसे एक बात पूछनी थी!" दिव्या हिचकते हुए बोली।

" हां बेटा बोली संकोच क्यों कर रही हो!" नरेश जी बोले।

"पापाजी मुझसे कोई गलती हुई है क्या आप मुझसे नाराज़ हैं या मेरी कोई बात बुरी लगी आपको ?" दिव्या बोली 

" नहीं तो बेटा पर क्यों पूछ रही तुम ऐसा!" नरेश जी हैरानी से बोले।

" पापा जी इतने दिन से देख रही हूं आप मेरी हर काम में मदद करते हैं जबकि मम्मीजी के सामने आप एक ग्लास पानी भी नहीं लेकर पीते थे!" दिव्या सिर नीचा कर बोली।

" हाहाहा तो तुम्हे लगा मैं तुमसे नाराज़ हूं... देखो बेटा जब तक तुम्हारी सास थी वो तुम्हारी मदद को थी अब वो नहीं है तो मुझे दोहरी जिम्मेदारी निभानी है मेरे लिए जैसे वत्सल वैसे तुम जैसे मैं उसकी सुख सुविधाओं का ध्यान रखता हूं तुम्हारा रखना भी मेरा फर्ज है!" नरेश जी प्यार से बोले।

," पापा जी!" दिव्या आंखों में आंसू भर केवल इतना बोली।

" हां बेटा अब मां और बाप दोनों की जिम्मेदारी मुझे उठानी है तुम्हे सुबह इतने काम होते वत्सल भी मदद नहीं कर पाता है तो मेरा फर्ज है कि मैं अपनी बेटी की थोड़ी मदद कर उसकी कुछ परेशानी तो हल कर सकूं, समझी बुद्धू मैं नाराज़ नहीं हूं तुमसे!" नरेश जी प्यार से दिव्या का सिर पर हाथ फेरते बोले।

दिव्या अपने ससुर के गले लग गई आज उसमे अपने ससुर में अपने मृत पिता नजर आ रहे थे। सच में पिता पिता ही होता फिर चाहे ससुर के रूप में क्यों ना हो।


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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 337 💮



*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐पेंशन💐💐*

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" सुनो, आज चार तारीख हो गई,पेंशन लेने का समय आ गया है।बैंक जा रहा हूँ,आने में देर हो जाए तो परेशान मत होना।युवाओं को समय की कद्र कहाँ, छोटे-छोटे काम में भी घंटों लगा देते हैं।" पत्नी को कहकर रामनिवास जी बाहर जाने लगे तो पत्नी ने पीछे से कहा, " आपके इतने सारे विद्यार्थी हैं, उन्हीं में से किसी को क्यों नहीं कह देते?" 

     " ज़माना बदल गया है।पहले जैसे विद्यार्थी अब कहाँ जो अपने गुरु का मान करें।उन्हें तो मेरा नाम भी याद नहीं होगा।" पत्नी को जवाब देकर वे बैंक चले गये।
     
 महीने का पहला सप्ताह होने के कारण बैंक में भीड़ थी।एक खाली कुर्सी देखकर वे बैठ गये और फार्म भरकर कैशियर वाले डेस्क के सामने खड़े हो ही रहें थें कि एक स्टाफ़ ने उन्हें आदर-सहित कुरसी पर बैठा दिया और स्वयं फ़ार्म लेकर कैशियर के केबिन में चले गये।वे कुछ समझ पाते तब तक में बैंक का चपरासी उनके लिए चाय ले आया।उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि वे बिना चीनी के चाय पीते हैं।चपरासी बोला, " साहब ने बिना चीनी वाली का ही आर्डर दिया है।" कहकर उसने रामनिवास जी के हाथ में चाय की प्याली थमा दी।
          
रामनिवास जी ने घड़ी देखी, दस बजकर पाँच मिनट हो रहें थे।सोचने लगे, चाय पिलाया है,लगता है दो घंटे से पहले मेरा काम न होगा।तभी एक बत्तीस वर्षीय सज्जन ने आकर उनके पैर छुए और विड्राॅ की गई राशि उनके हाथ पर रख दिया।इतनी जल्दी काम पूरा होते देख रामनिवास जी चकित रह गए।उन्होंने उन सज्जन को धन्यवाद देते हुए परिचय पूछा तो उन्होंने कहा, " सर, मैं इस बैंक का नया मैनेजर हूँ, एक सप्ताह पहले ही मैंने ज्वाॅइन किया है लेकिन उससे पहले मैं आपका विद्यार्थी हूँ।" 
        
" विद्यार्थी! " रामनिवास जी ने आश्चर्य से पूछा।उन्होंने कहा, "जी सर, सन् 2004 में आप सहारनपुर के उच्च माध्यमिक विद्यालय में नौवीं कक्षा के विद्यार्थियों को गणित पढ़ाते थें।मैं भी उन्हीं में से एक था।गणित मुझे समझ नहीं आती थी।परीक्षा में पास होने के लिए मैंने नकल करना चाहा और पकड़ा गया।प्रिंसिपल सर मुझे रेस्टीकेट कर रहें थें तब आपने उनसे कहा था कि नासमझी में विद्यार्थी तो गलती करते ही हैं।हम शिक्षक हैं, हमारा काम उन्हें शिक्षा देने के साथ-साथ सही राह दिखाना भी है।संजीव की यह पहली गलती है,रेस्टीकेट कर देने से तो इसका पूरा साल बर्बाद हो जाएगा जो मेरे विचार से उचित नहीं है।आपने उनसे विनती की थी कि मुझे माफ़ी देकर अगली परीक्षा में बैठने दिया जाए।प्रिंसिपल सर ने आपकी बात मान ली थी,आपने अलग से मुझे ट्यूशन पढ़ाया और मैं परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होकर आज आपके सामने खड़ा हूँ।आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सर!" हाथ जोड़कर मैनेजर साहब ने अपने गुरु को धन्यवाद दिया और ससम्मान उन्हें बाहर तक छोड़ने भी गए।
   
घर लौटते वक्त रामनिवास जी सोचने लगे, ज़माना चाहे कितना भी बदल जाए, जीवन भले ही मशीनी हो जाए लेकिन विद्यार्थियों के दिलों में शिक्षक का सम्मान हमेशा रहेगा,यह आज बैंक मैनेजर संजीव ने दिखा दिया।



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*💐💐बेटी💐💐*

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"पापा मैं कल से कॉलेज नहीं जाऊंगी...अब और बर्दाश्त नहीं होता मुझसे।" कोयल ने लगभग रोते हुए अपने पिता सुंदर से कहा।

"क्या हुआ बेटी बताओ कुछ, यूँ रोना बन्द करो, बताओ भी।" सुंदर ने पूछा।

"पापा रोज आते जाते रस्ते में एक लड़का है, वो मुझे छेड़ता है, फिकरे कसता है, उसके साथ दो चार लड़के और भी रहते हैं, मेरा रस्ते चलना मुहाल कर दिया है इन लड़कों ने।" कोयल ने आँखों में पानी भरते हुए कहा।

"कौन कुत्ते हैं, तू अभी चल मेरे साथ , मैं उसकी खाल उधेड़ दूँगा।" सुंदर ने ताव खाते हुए कहा।

"नहीं , मैं नहीं जाऊंगी, आप ही जाओ, शमशेर नाम है उसका।" कोयल ने बताया।

सुंदर बहुत गुस्से में भरा गया, और लौटा तो उसका मुँह उतरा हुआ था।
"क्या हुआ, कोयल के पापा, उसको अच्छे से धमका आये न।" कोयल की माँ ने पूछा।

"अरे वो तो गुंडे हैं पूरे, छः सात जने थे, वो तो मरने मारने पर उतारू हो गए, और बोले ज्यादा गर्मी दिखायेगा तो  कोयल पर तेजाब डाल देंगे।" सुंदर ने घबराये हुए कहा।

"ओह अब क्या होगा। ये तो बहुत बड़ी बात हो गई, मेरा तो दिल घबरा रहा है, मेरी फूल सी बच्ची कितनी तकलीफ में आ जायेगी।" कोयल की माँ बहुत घबरा गई।

"वो लड़का अपने ननिहाल में रहता है यहाँ, मैंने उसके नाना का पता कर लिया है, उससे मिलकर गुहार लगाऊंगा कि अपने नाती को समझाए और वो हमारी कोयल को परेशान करना छोड़ दे। मैं उसके पास जाकर आता हूँ।" कहते हुए सुंदर उठ खड़ा हुआ।

 "मैं भी चलती हूँ, मैं भी उससे विनती करूंगी।" कोयल की माँ ने कहा।

"नहीं मैं ही जाता हूँ।" कहकर सुंदर चला गया।

"जी वो आपका नाती मेरी बेटी को राह चलते छेड़ता है, उसे समझाइए यूँ मेरी बेटी को न सताये। उसकी और मेरी इज़्ज़त का सवाल है। मेरी बेटी कहती है कि वो अब कॉलेज नहीं जाएगी।" सुंदर ने गिड़गिड़ाते हुए शमशेर के नाना से कहा।

*"सुषमा याद है क्या तुमको।" उस बुजुर्ग ने कहा।*

"सुषमा...ओह ..ह्म्म्म।" सुंदर ने बैठे हुए दिल से कहा।

https://youtu.be/I7Z6A0AuuL8?si=dlKHwLNsxYShvXHM

"याद है न तुम और तुम्हारे दो चार लफंगे दोस्त मेरी बेटी सुषमा को स्कूल जाते वक्त छेड़ते थे, मैंने अपनी इज़्ज़त के लिए उसकी स्कूल बीच में छुड़वाकर उसकी शादी कर दी थी। मैंने भी वही दर्द महसूस किया है जो आज तुम कर रहे हो। वक़्त अपना बदला लेता है, कल कोई सुंदर था आज कोई शमशेर है। वैसे बता दूं ये शमशेर सुषमा का ही बेटा है, वो अपनी माँ के साथ किये गए दुर्व्यवहार का बदला ले रहा है, और मुझे इससे सुकून मिल रहा है। चले जाओ यहाँ से इससे पहले कि शमशेर आकर तुम्हारे साथ हाथापाई करे।" उस बुजुर्ग ने सुंदर को अपने शब्दों के साथ जैसे जोर से जमीन पर ला पटका हो।

सुंदर ने एक दो मोहल्ले वालों से मदद के लिए कहा। सबने उसे यही कहा भाई अपने कर्म भूल गया क्या? मोहल्ले की लड़कियों को कितना सताया है तूने? अब खुद पर आई है तो मदद माँग रहा है... कोई मदद नहीं करेगा, कौन गुंडों के मुँह लगे।

सुंदर बिल्कुल टूटा हुआ घर आ गया, "क्या कहा उस आदमी ने ।" कोयल की माँ ने पूछा, कोयल भी वहीं बैठी थी। 
"अरे वो बुड्ढा तो बहुत अकड़ू है, बोला मैं क्या करूँ जवान लड़के घरवालों की बात कहां मानते हैं। सुनो क्यों न हम पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दें।" सुंदर ने हिम्मत दिखाते हुए कहा।

"पापा पुलिस में शिकायत दर्ज की तो वो गुस्से में आकर मुझ पर तेजाब वेजाब न फेंक दें। अखबार में बहुत पढ़ने को मिलता है, और पुलिस भी उनको क्या सजा दिलवा पाएगी, साल छह महीने से ज्यादा तो सजा होगी नही उन्हें।" कोयल ने आशंका जताई।

"अब मैं क्या करूँ बेटा, कहाँ जाऊँ किससे मदद मांगू,मोहल्ले में भी कोई साथ देने को तैयार नहीं है।" सुंदर ने बिल्कुल निढाल और लगभग रोते हुए कहा।

"मोहल्ले वाले तो तब मदद करते न पापा, जब आप एक अच्छे इंसान होते। पूरे मोहल्ले की लड़कियों को आपने अपने दो चार लफंगे दोस्तों के साथ मिलकर परेशान किया है। अब कहाँ हैं वो आपके लफंगे दोस्त? कितनी लड़कियों की पढ़ाई आप जैसे शोहदों और दिलफेंक आशिकों की वजह से उनके घरवालों ने छुड़वा दी, क्योंकि उन सबमें भी जैसे आज आपकी हिम्मत नहीं है उस तरह हिम्मत नहीं थी। जानते हो वो जो शमशेर है न उसकी माँ का नाम सुषमा है, वो पढ़ लिखकर एक टीचर बनना चाहती थी। उसकी पढ़ाई आपके कारण छूट गई। उसकी जल्दी शादी करवा दी गई, वो तो उसका पति अच्छा था जिसने उसे पढ़ाया और वो मेरे कॉलेज में अब प्रोफेसर है.... और ये शमशेर मुझे कोई छेड़ता वेडता नहीं है। उसकी माँ ने उसे महिलाओं का सम्मान करना सिखाया है। वो तो मुझे आपकी करतूतों का पता चला तब मैंने शमशेर और उसकी माँ के साथ मिलकर आपको सबक सिखाने के लिए ड्रामा किया है। पापा आप जो दूसरों के साथ करते हैं न वो आपको भी कभी देखना पड़ सकता है….इसलिए किसी को सताना नहीं चाहिए…..आपने वो कहावत तो सुनी होगी न…'मत सता लड़की को पाप होगा, तू भी किसी दिन किसी लड़की का बाप होगा।' 
कोयल ने हिकारत भरी नजरों से सुंदर से कहा।

सुंदर सर झुकाए अपने पाँवों से जमीन कुरेद रहा था।

"आप अपने किये गए अपराध का प्रयाश्चित कर सकते हैं, आप लोगों को समर्थन में लीजिये और एक अपना ग्रुप बनाइये जो मौहल्ले की लड़कियों को छेड़ने वालों को सबक सिखा सके, 10 के आगे पांच का कोई मोल नहीं रहता, आप ये करेंगे तो आस पास के मौहल्लों में भी ये बात जाएगी, वो भी शायद ऐसा कोई ग्रुप बना लें, जिसका उद्देश्य हो 'बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ' पापा आपको ये करना ही होगा...कहीं से तो नई शुरुआत होनी ही चाहिए।" कहकर कोयल अपने शर्मिंदा हुये पापा के गले से लग गई!!

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एक व्यक्ति धन की कामना से ठाकुर जी की सेवा करता था। उसका धन बढ़ने की बजाय नष्ट होता गया। 

एक दिन उसकी भेंट किसी साहूकार से हुई जब दोनों में वार्तालाप हुआ तो साहुकार बोला- "आप गलत मूर्ति का पूजन कर रहे हैं। ठाकुर जी तो केवल अपने चरणों की भक्ति देते हैं या फिर जन्म-मरण के बंधन से सदा-सदा के लिए मुक्ति दिलवा देते हैं। धन देने वाली तो मां लक्ष्मी हैं। आप उनकी सेवा करें।"

उस व्यक्ति को तो केवल धन की कामना थी फिर चाहे वो ठाकुर जी की भक्ति से हो या देवी लक्ष्मी की। उसने घर आकर ठाकुर जी की मूर्ति को उठाकर सिंहासन के किनारे कुछ दूरी पर रखी अलमारी में रख दिया और सिंहासन पर मुरली मनोहर की जगह देवी को सम्मान के साथ पधरा कर पूजा करने लगा।

एक दिन वह देवी को गुग्गुल की सुगंधित धूप दे रहा था। उसने देखा धूप का धुआं हवा से मुरलीमनोहर की ओर जा रहा है। उसे बहुत क्रोध आया और मन ही मन विचार करने लगा देना-लेना कुछ नहीं धूप सूंघने को तैयार बैठे हैं। देवी के धूप को सूँघ कर जूठी कर रहे हैं। उसने रूई ली और ठाकुर जी की नाक में ठूंस दी।

उसी समय ठाकुर जी प्रगट हो गए और बोले- "वर मांगों।"

वो व्यक्ति बोला- "वरदान मैं बाद में माँगुंगा पहले यह बताएं जब मैं आपकी सेवा करता था तब तो आप जड़ बने रहे अब आप कैसे प्रसन्न होकर मुझे वरदान देने आ गए।"

ठाकुर जी बोले- "पहले तुम मुझे पत्थर की मूर्ति समझते थे तो मैं भी जड़ बना रहा परंतु अब तुमने मुझे साक्षात भगवान समझा तुम्हें विश्वास हो गया की मैं धूप सूंघ रहा हूं। तो मैं भी सच में तुम्हारे सामने आ गया।"

शास्त्र कहते हैं *जिसकी जैसी भावना होती है व जिसका जैसा विश्वास होता है उसकी सिद्धि भी उसी प्रकार होती है।*


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*💐💐तीन कुत्ते💐💐*

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एक बार एक गाँव में पंचायत लगी थी। वहीं थोड़ी दूरी पर एक सन्त ने अपना बसेरा किया हुआ था। जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी तो किसी ने कहा कि क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें, अतः सभी सन्त के पास पहुँचे।
          जब सन्त ने गांव के लोगों को देखा तो पुछा कि कैसे आना हुआ ? तो लोगों ने कहा, “महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है।”
          सन्त ने पुछा- हुआ क्या ? पानी क्यों नहीं पी सकते हो ?
          लोग बोले- तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे। बाहर नहीं निकले, मर गये उसी में। अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कैसे पिये महात्मा जी ?
          सन्त ने कहा - 'एक काम करो, उसमें गंगाजल डलवाओ।
          कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया। फिर भी समस्या जस की तस रही। लोग फिर से सन्त के पास पहुँचे। अब सन्त ने कहा, "भगवान की कथा कराओ।”
          लोगों ने कहा, “ठीक है।” कथा हुई, फिर भी समस्या जस की तस। लोग फिर सन्त के पास पहुँचे। अब सन्त ने कहा, उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ। सुगंधित द्रव्य डाला गया, नतीजा फिर वही। ढाक के तीन पात। लोग फिर सन्त के पास, अब सन्त खुद चलकर आये।
          लोगों ने कहा- महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया। गंगाजल भी डलवाया, कथा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं। 
          अब सन्त आश्चर्यचकित हुए और पूछा- कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते जो मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं ?
          लोग बोले - उसके लिए न आपने कहा था न हमने निकाला, बाकी सब किया। वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं।
          सन्त बोले - "जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा।"

          ऐसी ही कथा हमारे जीवन की भी है। इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं।
          हम उपाय पूछते हैं तो लोग बताते हैं, तीर्थयात्रा कर लो, गंगा स्नान कर लो, थोड़ा पूजा करो, थोड़ा पाठ। 
          सब करते हैं, पर बदबू उन्हीं दुर्गुणों की आती रहती है। तो पहले इन्हें निकाल कर बाहर करें तभी जीवन उपयोगी होगा।

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