,दुःख का कारण केवल पाप ही नहीं है ,ऋषि चिंतन से भाग 3






ऋषि चिंतन से । दुःख का कारण केवल पाप ही नहीं है 

 🌺 ऋषि चिंतन से 11 🌺 Rishi chintan se 11 🌺



*🌹११ सितंबर  २०२२  रविवार 🌹*
*//आश्विन कृष्णपक्ष प्रतिपदा२०७९//*
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             *‼️ऋषि चिंतन‼️*
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      *--🥀दुःख का कारण🥀--*
       *➖केवल पाप ही नहीं है ➖*
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👉  आमतौर से दुःख को नापसंद किया जाता है । *लोग समझते हैं कि पाप के फलस्वरूप अथवा ईश्वरीय कोप के कारण दुःख आते हैं, परंतु यह बात पूर्णरूपेण से सत्य नहीं है ।* दुःखों का एक कारण पाप भी है यह तो ठीक है, परंतु यह ठीक नहीं कि समस्त दुःख-पापों के कारण ही आते हैं ।
👉 कई बार ऐसा भी होता है कि ईश्वर की कृपा के कारण, पूर्व संचित पुण्यों के कारण और पुण्य संचय की तपश्चर्या के कारण भी दुःख आते हैं । *भगवान को किसी प्राणी पर दया करके उसे अपनी शरण में लेना होता है, कल्याण के पथ पर ले जाना होता है, तो उसे भवबंधन से कुप्रवृत्तियों से छुड़ाने के लिए ऐसे दुःखदायक अवसर उत्पन्न करते हैं, जिनकी ठोकर खाकर मनुष्य अपनी भूल समझ जाए, निद्रा को छोड़कर सावधान हो जाए ।*
👉 सांसारिक मोह, ममता और विषय-वासना का चस्का ऐसा लुभावना होता है कि उन्हें साधारण इच्छा से छोड़ा नहीं जा सकता । *एक हलका सा विचार आता है कि जीवन जैसी अमूल्य वस्तु का उपयोग किसी श्रेष्ठ काम में करना चाहिए, परंतु दूसरे ही क्षण ऐसी लुभावनी परिस्थितियां सामने आ जाती हैं, जिनके कारण वह हलका विचार उड़ जाता है और मनुष्य जहाँ का तहाँ उसी तुच्छ परिस्थिति में पड़ा रहता है ।* इस प्रकार कीचड़ में से निकालने के लिए भगवान अपने भक्त को झटका मारते हैं, सोते हुए को जगाने के लिए बड़े जोर से झकझोरते हैं । यह झटका और झकझोरना हमें दुःख जैसा प्रतीत होता है ।
👉 *मृत्यु के समीप तक ले जाने वाली बीमारी, परम प्रिय स्वजन की मृत्यु, असाधारण घाटा, दुर्घटना, विश्वसनीय मित्रों द्वारा अपमान या विश्वासघात जैसी दिल को चोट पहुँचाने वाली घटनाएँ इसलिए भी आती है,  कि उनके जबरदस्त झटके के आघात से मनुष्य तिलमिला जाए और सहज होकर अपनी भूल सुधार ले । गलत रास्ते को छोड़कर सही मार्ग पर आ जाए ।*
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 *//➖गहना कर्मणोगति➖//पृष्ठ-३८*
      *💦पं.श्रीराम शर्मा आचार्य💦*
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 🌺 ऋषि चिंतन से 12 🌺 Rishi chintan se 12 🌺



*🥀२५ जनवरी २०२३ बुधवार🥀*
*🍁माघ शुक्लपक्ष चतुर्थी २०७९🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖❗निरहंकारी बनिए❗➖*
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👉 *व्यवहार कुशलता के लिए "निरहंकारिता" का होना भी आवश्यक है ।* मनुष्य की यह एक मानसिक कमजोरी है कि वह अपने शरीर, स्वरुप, धन, वैभव, विद्या, संपन्नता, कीर्ति आदि का गर्व करके अपने बड़प्पन और अहंकार के समक्ष दूसरों को तुच्छता की दृष्टि से देखता है । यह अव्यावहारिक एवं तुच्छता का चिन्ह माना  गया  है । संसार में एक से  एक बड़े धनी मानी, संपन्न, विद्वान-योग्य बैठे हुए हैं । *फिर किस बात की अहमन्यता !* इस प्रकार की अहंकारिता प्रगतिशीलता के मार्ग को अवरुद्ध कर देती है और मनुष्य को आगे नहीं बढ़ने देती । साथ ही इस प्रकार का अहंकार समाज में सम्मानास्पद न माना  जाएगा । उसके कारण दूसरे असंतुष्ट होंगे और उदास होकर असहयोग करने लगेंगे । *इसलिए मिथ्या अहंकार का त्याग कीजिए ।* अपनी योग्यता, संपन्नता आदि को छोटा मानकर और वृद्धि के लिए प्रयत्न कीजिए, *अहंकारशून्य होकर दूसरों को बड़प्पन, महत्व प्रदान कीजिए, इसी में आपका भी बड़प्पन और महत्व है ।* 
👉 *निरहंकारिता के लिए आवश्यक है कि दूसरों के दृष्टिकोण का आदर एवं सम्मान करना सीखा जाए ।* कोई उत्तम बात कहे तो उसे स्वीकार करना ही चाहिए, किंतु अन्य कोई व्यक्ति अपनी हठधर्मी एवं अहमन्यतावश अपने गलत दृष्टिकोण पर भी जोर दे रहा हो तो उस समय उसका भी सम्मान कीजिए और सद्भावना प्रकट कीजिए, फिर एकांत में उससे मिलकर विचार-परामर्श कीजिए । वह अपने गलत  दृष्टिकोण को वापस लेकर आपका सहयोगी बन जाएगा । *अतः दूसरों के दृष्टिकोण का आदर कीजिए ।*
👉 *बरबस, जबरन आपका सही दृष्टिकोण भी किसी पर थोपने की चेष्टा न कीजिए । यह भी अहंकार वृत्ति का सूचक है ।* आप केवल नम्रता भरे शब्दों में अपना सुझाव एवं राय दे सकते हैं । उस पर आप भी व्यक्तिगत कोई जोर न दें । *दूसरे व्यक्तियों को तर्क से आप के विषय अथवा सुझाव को मानने दीजिए ।* इस प्रकार की वृत्ति सफल जीवन  एवं दूसरों के सहयोग और मित्रता  की वृद्धि करती है ।
👉 *अनावश्यक उपदेश देने का प्रयत्न भी मत करिए, समाज आपसे जबरन उपदेश ग्रहण नही करेगा, न उसका आदर ही करेगा ।* आप अपना सुझाव और विचार पेश कीजिए, जनता को तर्क एवं विचार बल से उस पर अमल करने दीजिए ।
👉 *दूसरों के साथ अनधिकार चेष्टा करना भी अहंकार में ही सम्मिलित है ।* बिना मतलब, अपनी योग्यता का प्रदर्शन करने के लिए या  दूसरों को अपने कार्य में अयोग्य समझते हुए अनावश्यक हस्तक्षेप मत कीजिए । इसे प्रतिपक्षी लोग कभी अच्छा न समझेंगे और आपके प्रति उनके विचार अच्छे न होंगे ।
👉 *आवश्यकता से अधिक  न बोलिए ।* ज्यादा बोलना मूर्खता एवं  घमंड का प्रदर्शन करना है । *बातूनी, शेखीखोर, टीपटाप लगाकर बोलने वाला व्यक्ति घटिया दर्जे का माना जाता है ।* ऐसा व्यक्ति काम भी कम करता है, *अत: इतना बोलिए, जो अवश्यक हो, जिससे आपका तथा दूसरों का कुछ हित साधन हो सके ।* बेकार बकवास करने से आपके व्यक्तित्व का मूल्य घट जाएगा और आपकी शक्तियों का क्षय होगा ।
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*हम बदलें, तो दुनिया बदले । पृष्ठ-१४४*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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 🌺 ऋषि चिंतन से 13 🌺 Rishi chintan se 12🌺




*🥀//१९ मार्च २०२३ रविवार//🥀*
*🔆चैत्र कृष्णपक्ष त्रयोदशी२०७९🔆*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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 *--व्यक्तित्व छुपाया नहीं जा सकता--*
   
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👉 अपनी वस्तु स्थिति एक सीमा तक ही छुपाकर रखी जा सकती है । *"व्यक्तित्व" में इतने अधिक छिद्र होते हैं कि उनमें होकर वस्तुस्थिति की झाँकी-गंध दूसरों तक पहुँच जाती है ।* उस पर देर तक पर्दा नहीं डाला जा सकता । जिन वस्तुओं को छुपाया जा सकता है, वे दूसरी हैं । उनमें व्यक्तित्व की गणना नहीं होती । *हम जहाँ भी जायेंगे वहीं हमारा "व्यक्तित्व" वस्तुस्थिति का अनचाहे ही प्रदर्शन-प्रकटीकरण करता रहेगा ।* उसे आवरर्णों में ढकने के सारे प्रयास निष्फल होते हैं । जो जैसा है, वह लोगों की आँखों में आकर ही रहेगा । कृत्रिम निंदा या स्तुति से भले को बुरा और बुरे को भला बताने के लिए कितने ही आडंबर क्यों न रखे जायें, वे देर तक काम न दे सकेंगे । *यथार्थता हजार पर्दे फाड़ कर बाहर आ जाती है ।* पारे को खाकर पचाया नहीं जा सकता । वह शरीर से फूटकर बाहर निकलता ही है । *ठीक इसी प्रकार चरित्र की अवांछनीयताएँ कल नहीं तो परसों प्रकट होकर ही रहती हैं, और उसकी दुर्गंध हवा में सहज ही उड़ती चली जाती है ।*
👉 चरित्र से वाणी में सामर्थ्य उत्पन्न होती है । *"चिंतन" और "क्रिया" का समन्वय ही "चरित्र" है ।* पूरब की सोचने वाले और पश्चिम को चलने वाले उपहासास्पद होते हैं । *मंजिल तक वे पहुँचते हैं जिनके विचारों और कार्यों की दिशा एक है ।* भले ही नहीं, बुरे भी इस आधार पर सफल होते हैं । एक वेश्या अपने प्रभाव से सैकड़ों को दुराचारी बना देती है । एक शराबी अपने कई पक्के साथी बना लेता है । चोर, जुआरी, व्यसनी अपना संप्रदाय-परिवार बढ़ाते ही रहते हैं । *इसका कारण यह है कि उनके "विचार" और "कार्य" एक हैं । जैसा सोचते हैं, वैसा करते भी हैं ।* जहांँ भी विचार और कर्म का समन्वय होगा वहाँ व्यक्तित्व बनेगा और वही प्रभावोत्पादक शक्ति बढ़ेगी । भले लोगों के संबंध में भी यही सिद्धांत लागू होता है । *यदि "सद्भावनाएँ" और "सत्प्रवृत्तियाँ" किसी व्यक्ति में विद्यमान होंगी, तो कोई कारण नहीं कि वह दूसरों को उसी दिशा में आकर्षित न कर सके ।*
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*भाषण और संभाषण की दिव्य क्षमता- पृष्ठ- ३४*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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 🌺 ऋषि चिंतन से 14 🌺 Rishi chintan se 14 🌺


*🥀२८ जनवरी २०२३ शनिवार🥀*
*🍁माघ शुक्लपक्ष सप्तमी २०७९🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖शुभ सोचें〰️शुभ ही होगा➖*
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👉 *इस विश्व में जो "श्रेष्ठता", "सौंदर्य" और "महानता" दिखाई पड़ती है, वह मनुष्य के "सद्विचारों" और "सत्कर्मों" का ही परिणाम है ।* अपनी अच्छी-बुरी भावनाओं के अनुसार ही जीवन में क्रियाशीलता उत्पन्न होती है । जो सोचते हैं वही करते हैं, इसी के अनुरूप अच्छे-बुरे कर्मों का दंड या पुरस्कार मिलता है । *कर्म का महत्व जो जी में आये करने से नहीं होता, वरन् उसके भले या बुरे प्रतिफल से होता है ।* आम का पेड़ लगाना या बबूल बोना दोनों क्रियाएँ एक जैसी हैं। शक्ति उद्यम व साधन दोनों को एक समान ही जुटाने पड़ते हैं । किंतु आम रोपने का प्रतिफल सुंदर स्वाद युक्त फल, सुखद घनी छाया है और बबूल से न तो छाँव मिलती है न मीठे फल । काँटे बिखेर कर दूसरों को दु:ख-पीड़ा पहुँचाने का अपकार ही बबूल से बन सकता था । इसके लिए उसकी सर्वत्र निंदा व भर्त्सना ही की जाती है ।
👉 *मनुष्य स्वत:अच्छा या बुरा नहीं है ।* यह ढलाव तो विचारों के साँचे में होता है । गीली मिट्टी को विभिन्न प्रकार के साँचे में दबाकर भाँति-भाँति के खिलौने बनाते हैं । *विचारों के साँचे में व्यक्ति का निर्माण होता है ।* दूषित स्वार्थपूर्ण विचारों से मनुष्य हीन बनता है । दुष्टतापूर्ण, दुष्कर्मों के कारण वह दु:ख और त्रास पाता है । *मंगल-चिंतन व शुभकर्मों से आंतरिक सौंदर्य के दर्शन होते हैं । श्री, समृद्धि और सफलता का सुख मिलता है ।*
👉बुरे विचारों की कीचड़ में फँसा हुआ व्यक्ति अपना प्रभाव खो देता है । यद्यपि उसकी नैसर्गिक पवित्रता नष्ट नहीं हुई, उसकी शक्ति ज्यों की त्यों बनी हुई है, किंतु मान गिर गया, कीमत गिर गई । *कुविचार और कुकर्म सदैव मनुष्य को अधोगामी ही बनाते हैं ।*
👉 देखने में आता है कि लोग प्राय: दूसरों के ऐब निकालते रहते हैं, यह क्रोधी है, यह निकम्मा है, *दृढ़ता पूर्वक न्यायिक दृष्टि से निरीक्षण करने पर हमें अपने आप में ही अनेक दोष दिखाई दे जाते हैं, नहीं तो यह छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति ही किस अपराध से कम है ।* निरंतर बुरे विचार करते रहने से अशुभ कर्म ही बन सकते हैं । कटुता, कलह, द्वेष दुर्भाव, विभाजन तथा असहयोग ही इसके परिणाम हो सकते हैं ।
👉 स्वभावत: मनुष्य की इच्छाओं में बहुत कुछ समानता होती है । दूसरों से प्रेम, स्नेह, आत्मीयता, सहयोग और सहानुभूति की अपेक्षा सभी रखते हैं, पर जब व्यावहारिक रूप में हम दूसरों के साथ ऐसा बर्ताव नहीं करते तो इसे कुविचार माना जाता है । *अपने "अहंकार" को "श्रेष्ठ" मानना और अपनी इच्छाओं की उचित अनुचित किसी भी तरह की पूर्ति करने को ही "पाप" माना गया है ।* अपकार को पाप कहते हैं । क्योंकि यह दुर्भावनाओं के कारण होता है । *"परोपकार" पुण्य है, क्योंकि यह "सद्भावना" का प्रतीक है । संक्षेप में मंगलमय कामनाएँ "पुण्य" और स्वार्थपूर्ण भावनाओं को ही "पाप" कहा जा सकता है ।*
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*हम बदलें, तो दुनिया बदले । पृष्ठ-१५७*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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 🌺 ऋषि चिंतन से 15 🌺 Rishi chintan se 15🌺




*🥀२७ जनवरी २०२३ शुक्रवार🥀*
*🍁माघ शुक्लपक्ष षष्ठी २०७९🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*यह संसार अनुशासन से चलता है*
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👉 सूर्य, पृथ्वी, चंद्रमा एवं अन्य सभी ग्रह-उपग्रह एक ठीक-ठीक नियम व्यवस्था और विधान के अनुसार काम करते हैं । संसार की प्रत्येक छोटी से लेकर बड़ी घटनाओं के पीछे एक नियामक विधान ही काम करता है । *"मनुष्य" का जीवन भी इस विश्व नियम से अलग नहीं है, वरन् जीवन की प्रत्येक गतिविधि का नियमन भी इसी से होता रहा है ।*
👉 *नियति चक्र, विश्व नियम, नैतिक विधान एक विवेकपूर्ण व्यवस्थित सुनियोजित तथ्य है ।* जिसका स्वभाव *"सत्यम्" "शिवम्" "सुंदरम्"* की रचना सर्जना करना है । यह इतना ही सत्य है, जितना विश्व और मानव शरीर में काम करने वाली अमर चेतना, साथ ही उतना ही सूक्ष्म और दुरूह भी है । *इसे जानना-समझना उसी तरह क्लिष्ट है जैसे शरीर में आत्मा को जानना ।* यही कारण है कि अधिकांश लोग इसे समझ नहीं पाते । खासकर व्यक्ति अपने सीमित ज्ञान तथा तुच्छ दृष्टिकोण से इस असीमित, सर्वव्यापी तथ्य को बहुदा समझ नहीं पाते ।
 👉 *विश्व विधान, नियति चक्र की अनुभूति के लिए विवेकयुक्त - निरपेक्ष बुद्धि की आवश्यकता है ।* अविवेकी अज्ञ मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं का हल ही नहीं निकाल सकता, तो इस संसार के मूल नियम, मूल विधान को समझने की बात और भी दुरूह है । *इस तरह के अज्ञानी जन जीवन की बाह्य घटना और उनके अच्छे बुरे परिणामों से ही सुखी दु:खी होते रहते हैं । वे नहीं समझते कि उन्हें सुधारने के लिए ही दु:ख एवं कष्ट दंड रूप में किसी नियति की प्रेरणा से मिलते हैं ।* इसी तरह अच्छे कार्यों का परिणाम सुख, शांति, प्रफुल्लता, उल्लास-वरदान के रूप में मिलता है ।
👉 *गंभीर चिंतन के द्वारा मनुष्य विचार करें तो उसे भौतिक बाह्य जगत के प्रत्येक क्रियाकलाप के अंतर्गत एक शक्ति काम करती हुई मालूम पड़ेगी । *एक नियत विधान के अनुसार संसार के कार्यों का नियमन संचालन होता दिखाई देगा ।* आग छूने पर जला देती है । पानी गीला कर देता है । विद्युत छूने पर प्राण हरण कर लेती है । बर्फ ठंडी लगती है । कदाचित नक्षत्र टकरा जाएँ तो विश्व में खलबली मच जाए । *इसी तरह कई नियम देखे जा सकते हैं ।* यह बाह्य जगत में काम करते हैं, इसलिए इन्हें भौतिक नियम कहा जाएगा । *सूक्ष्म जगत में काम करने वाले नैतिक नियम कहलाते हैं ।* प्रत्यक्ष रूप में किसी इंद्रिय के सहयोग से इनको नहीं जाना जा सकता, *किंतु गंभीरतापूर्वक सूक्ष्मदृष्टि के साथ देखने पर इन्हें उसी तरह जाना जा सकता है, जैसे किसी भौतिक नियम को जाना जा सकता है ।*
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*हम बदलें, तो दुनिया बदले । पृष्ठ-१५२*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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